दूसरे जिले या राज्य में हुई घटना की FIR कहां दर्ज करें?
दूसरे जिले या राज्य में अपराध होने पर FIR कहां दर्ज कराएं? जानें Zero FIR, पुलिस के क्षेत्राधिकार, FIR ट्रांसफर और शिकायत दर्ज न होने पर कानूनी उपाय।
दूसरे जिले या राज्य में अपराध होने पर FIR कहां दर्ज कराएं? क्या घटना वाले जिले में जाना जरूरी है या अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में भी शिकायत की जा सकती है? यह सवाल विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है, जब पीड़ित घटना के बाद घर लौट चुका हो, अपराध कई स्थानों पर हुआ हो या उसका सही स्थान स्पष्ट न हो।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना घटना के स्थान की परवाह किए बिना पुलिस थाने में दी जा सकती है। हालांकि, FIR दर्ज करना, उसकी जांच करना और मुकदमे की सुनवाई करना अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि दूसरे जिले या राज्य में हुई घटना की FIR कहां दर्ज कराई जा सकती है और उसके बाद मामला किस पुलिस थाने के पास जाएगा।
दूसरे जिले या राज्य में हुई घटना की FIR कहां दर्ज कराएं?
यदि किसी व्यक्ति के साथ दूसरे जिले या राज्य में संज्ञेय अपराध हुआ है, तो वह घटना वाले क्षेत्र के संबंधित पुलिस थाने में सीधे FIR दर्ज करा सकता है। इसके अलावा, वह अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में भी अपराध की सूचना दे सकता है। केवल घटना दूसरे जिले या राज्य में होने के कारण पुलिस उसे वहीं जाकर शिकायत दर्ज कराने के लिए नहीं कह सकती।
उदाहरण के लिए, राजस्थान का कोई व्यक्ति दिल्ली में अपराध का शिकार होने के बाद जयपुर लौट आता है। वह दिल्ली के संबंधित पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करा सकता है या जयपुर के स्थानीय पुलिस थाने में भी संज्ञेय अपराध की सूचना दे सकता है। हालांकि, आगे की जांच किस थाने द्वारा की जाएगी, यह अपराध के तथ्यों और लागू क्षेत्राधिकार के आधार पर निर्धारित होगा।
संज्ञेय अपराध की सूचना घटना के स्थान की परवाह किए बिना पुलिस थाने के प्रभारी को दी जा सकती है। इसलिए केवल क्षेत्राधिकार का हवाला देकर ऐसी सूचना दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, धारा 173(3) में कुछ निर्धारित अपराधों के लिए प्रारंभिक जांच का सीमित प्रावधान भी है।
घटना वाले जिले में सीधे FIR दर्ज कराना कब उपयोगी है?
यदि अपराध का स्थान स्पष्ट है और शिकायतकर्ता अभी उसी जिले में मौजूद है, तो संबंधित पुलिस थाने में सीधे FIR दर्ज कराना व्यावहारिक हो सकता है। विशेष रूप से तब, जब घटनास्थल का निरीक्षण करना हो, स्थानीय गवाहों से पूछताछ करनी हो या घटनास्थल पर उपलब्ध साक्ष्यों को शीघ्र सुरक्षित करना आवश्यक हो।
मान लीजिए किसी व्यक्ति की कार दूसरे जिले में चोरी हो जाती है और वह अभी उसी जिले में मौजूद है। ऐसी स्थिति में घटनास्थल के संबंधित पुलिस थाने को तत्काल सूचना देने से आसपास के गवाहों, कैमरों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के बारे में शीघ्र जानकारी जुटाई जा सकती है।
यदि घटनास्थल के आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज या स्थानीय गवाहों की जानकारी उपलब्ध है, तो पुलिस को उसके बारे में यथाशीघ्र बताएं। इससे समय बीतने के कारण महत्वपूर्ण साक्ष्य अनुपलब्ध होने का जोखिम कम किया जा सकता है।
दूसरे राज्य से लौटने के बाद अपने जिले में FIR कैसे दर्ज कराएं?
अपराध के बाद पीड़ित अपने गृह राज्य लौट चुका हो, तो केवल FIR दर्ज कराने के लिए उसे दोबारा घटनास्थल पर जाने की आवश्यकता नहीं है। वह BNSS की धारा 173(1) के अंतर्गत अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में संज्ञेय अपराध की सूचना दे सकता है।
यदि अपराध उस पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार से बाहर हुआ है, तो भी वहां Zero FIR दर्ज की जा सकती है। इसके बाद मामला संबंधित क्षेत्र के पुलिस थाने को भेजा जा सकता है, ताकि आगे की जांच की जा सके।
शिकायत में घटना की तारीख, समय, स्थान और उपलब्ध साक्ष्यों का स्पष्ट विवरण दें। यदि घटनास्थल का सटीक पता मालूम नहीं है, तो उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्थान और परिस्थितियां बताएं। अनुमानित जानकारी को निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत न करें।
BNSS की धारा 173(2) के अनुसार दर्ज की गई सूचना की प्रति शिकायतकर्ता या पीड़ित को तत्काल निःशुल्क दी जानी चाहिए। इसलिए स्थानीय थाने में FIR दर्ज होने पर उसकी प्रति अवश्य प्राप्त करें।
अपराध कई जिलों या राज्यों में हुआ हो तो FIR कहां दर्ज होगी?
कुछ अपराध किसी एक स्थान तक सीमित नहीं होते। अपराध का एक हिस्सा एक जिले में और दूसरा हिस्सा दूसरे जिले में हो सकता है। कभी अपराध का सही स्थान स्पष्ट नहीं होता, तो कभी उससे संबंधित अलग-अलग कार्य विभिन्न राज्यों में किए जाते हैं। ऐसी स्थिति में संज्ञेय अपराध की सूचना BNSS की धारा 173(1) के अनुसार दी जा सकती है, लेकिन आगे की जांच और मुकदमे की सुनवाई का क्षेत्राधिकार अपराध के वास्तविक तथ्यों पर निर्भर करेगा।
अपराध के अलग-अलग हिस्से विभिन्न स्थानों पर हुए हों
BNSS की धारा 198 उन परिस्थितियों में न्यायालय के क्षेत्राधिकार से संबंधित है, जिनमें अपराध का स्थान अनिश्चित हो, अपराध आंशिक रूप से अलग-अलग स्थानीय क्षेत्रों में हुआ हो, वह लगातार विभिन्न क्षेत्रों में होता रहा हो या उसमें अलग-अलग स्थानों पर किए गए कई कार्य शामिल हों। ऐसे मामलों में संबंधित स्थानीय क्षेत्रों के न्यायालयों को विचारण का क्षेत्राधिकार प्राप्त हो सकता है।
यह प्रावधान न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई से संबंधित है। पुलिस की जांच संबंधी शक्तियों के लिए BNSS की धारा 175 महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी न्यायालय को मुकदमे की सुनवाई का क्षेत्राधिकार प्राप्त होना और किसी पुलिस थाने द्वारा FIR दर्ज करना एक ही कानूनी प्रश्न नहीं हैं।
अपराध एक राज्य में और उसका परिणाम दूसरे राज्य में हो
कुछ अपराधों में आरोपी का कार्य एक स्थान पर होता है, जबकि उस अपराध का कानूनी रूप से प्रासंगिक परिणाम दूसरे स्थान पर सामने आता है। BNSS की धारा 199 के अनुसार, संबंधित परिस्थितियों में अपराध का विचारण उस स्थान पर भी हो सकता है जहां कार्य किया गया या जहां उसका परिणाम सामने आया।
हालांकि, शिकायतकर्ता के दूसरे राज्य में रहने या वहां आर्थिक नुकसान महसूस होने मात्र से हर मामले में उस राज्य के न्यायालय का क्षेत्राधिकार स्थापित नहीं हो जाता। अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों और उनसे संबंधित स्थानों के आधार पर अदालत का क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाता है।
BNSS की धारा 173(1) संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज कराने से संबंधित है। धारा 175 पुलिस की जांच संबंधी शक्तियों का प्रावधान करती है, जबकि धाराएं 197 से 199 न्यायालय के क्षेत्रीय जांच और विचारण क्षेत्राधिकार से संबंधित हैं। इन प्रक्रियाओं को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
दूसरे राज्य से जुड़े साइबर अपराध में किस थाने में शिकायत करें?
साइबर अपराध में आरोपी, पीड़ित, बैंक खाता और डिजिटल माध्यम अलग-अलग राज्यों से संबंधित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को दूसरे राज्य से फर्जी कॉल करके उसके बैंक खाते से धनराशि निकाल ली गई हो। ऐसी स्थिति में अंतरराज्यीय साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने के लिए आरोपी के निवास स्थान या उसके बैंक खाते की जानकारी मिलने तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
यदि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो पीड़ित अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में भी सूचना दे सकता है। आगे की जांच का क्षेत्राधिकार अपराध से जुड़े स्थानों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित होगा।
यदि मामला ऑनलाइन धोखाधड़ी से संबंधित है और बैंक खाते से धनराशि निकल गई है, तो संबंधित बैंक को तत्काल सूचना दें। वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की शिकायत राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर भी दर्ज की जा सकती है।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना और पुलिस थाने में FIR दर्ज होना अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने के बाद उसकी स्थिति देखें और आवश्यकतानुसार संबंधित पुलिस थाने से संपर्क करें।
यदि धोखाधड़ी से धनराशि निकल गई है, तो सही पुलिस थाने का क्षेत्राधिकार निर्धारित होने की प्रतीक्षा न करें। संबंधित बैंक और 1930 हेल्पलाइन को यथाशीघ्र सूचना दें। ट्रांजैक्शन नंबर, भुगतान की तारीख, समय और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखें।
FIR दूसरे जिले या राज्य में कब भेजी जाती है?
यदि किसी पुलिस थाने में दर्ज FIR का संबंध दूसरे जिले या राज्य से है और उपलब्ध तथ्यों के अनुसार आगे की जांच उस क्षेत्र के पुलिस थाने द्वारा की जानी चाहिए, तो मामला संबंधित थाने को भेजा जा सकता है। इस प्रक्रिया में घटना का स्थान, अपराध की प्रकृति और उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
हालांकि, प्रत्येक अंतरराज्यीय घटना में FIR का स्थानांतरण अनिवार्य नहीं है। यदि अपराध के महत्वपूर्ण हिस्से एक से अधिक राज्यों में हुए हैं, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर जांच का क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाएगा।
FIR का एक पुलिस थाने से दूसरे पुलिस थाने में भेजा जाना और किसी आपराधिक मुकदमे का एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में स्थानांतरण अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
FIR दूसरे राज्य में भेजे जाने के बाद शिकायतकर्ता क्या करे?
यदि FIR दूसरे जिले या राज्य के पुलिस थाने को भेज दी गई है, तो शिकायतकर्ता को संबंधित थाने का नाम, उपलब्ध स्थानांतरण विवरण और जांच अधिकारी की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। प्रारंभिक FIR की प्रति, मूल शिकायत की पावती और पुलिस से प्राप्त महत्वपूर्ण पत्राचार भी सुरक्षित रखें।
आगे की पुलिस जांच के दौरान संबंधित अधिकारी शिकायतकर्ता से अतिरिक्त दस्तावेज, बयान या साक्ष्य मांग सकता है। यदि जांच अधिकारी बदल जाता है, तो उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर नए अधिकारी से मामले की प्रगति के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
यदि मामले से संबंधित कॉल रिकॉर्ड, संदेश, डिजिटल दस्तावेज या अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो उनके मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। केवल स्क्रीनशॉट पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध मूल संदेश, फाइलें और ट्रांजैक्शन विवरण भी संरक्षित करें।
- प्रारंभिक FIR की प्रति और उसका नंबर।
- FIR भेजे जाने संबंधी उपलब्ध विवरण।
- संबंधित पुलिस थाने का नाम और संपर्क जानकारी।
- जांच अधिकारी का नाम और संपर्क विवरण, यदि उपलब्ध हो।
- पुलिस को सौंपे गए दस्तावेजों और साक्ष्यों का रिकॉर्ड।
FIR दूसरे राज्य में भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि शिकायतकर्ता को हर कार्रवाई के लिए वहां उपस्थित होना पड़ेगा। हालांकि, बयान, पहचान या अन्य आवश्यक जांच कार्यों के लिए उसकी उपस्थिति की आवश्यकता मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होगी।
दूसरे जिले या राज्य की FIR पर सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से संबंधित विभिन्न मामलों में FIR दर्ज करने, पुलिस जांच और न्यायालय के क्षेत्राधिकार के बीच अंतर स्पष्ट किया है। इस विषय में दो निर्णय विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।
Satvinder Kaur v. State (Govt. of NCT of Delhi), 1999
इस मामले में दिल्ली में दर्ज FIR को क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के आधार पर रद्द किए जाने का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संज्ञेय अपराध की जांच के प्रारंभिक चरण में केवल इस आधार पर FIR रद्द करना उचित नहीं है कि कथित अपराध किसी दूसरे क्षेत्र में हुआ था।
न्यायालय ने तत्कालीन CrPC की धारा 156 के संदर्भ में पुलिस की जांच संबंधी शक्तियों पर विचार किया। निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया कि जांच के दौरान संबंधित क्षेत्राधिकार का प्रश्न सामने आने पर कानून के अनुसार मामला उचित पुलिस थाने को भेजा जा सकता है। केवल क्षेत्रीय सीमा का प्रश्न पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करने का आधार नहीं देता।
Rhea Chakraborty v. State of Bihar, 2020
इस मामले में पटना में दर्ज FIR और मुंबई से संबंधित घटनाओं के संदर्भ में क्षेत्राधिकार का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। न्यायालय ने शिकायत में लगाए गए आरोपों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर पटना में FIR दर्ज होने तथा बिहार पुलिस द्वारा की गई प्रारंभिक जांच को वैध माना।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि FIR को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने का प्रश्न संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार देखा जाना चाहिए। मामले की विशेष परिस्थितियों में न्यायालय ने CBI द्वारा जांच किए जाने को स्वीकार किया। इसलिए इस निर्णय को प्रत्येक अंतरराज्यीय FIR के स्वतः स्थानांतरण या गैर-स्थानांतरण का सामान्य नियम नहीं माना जा सकता।
ये दोनों फैसले पुराने कानून CrPC के समय दिए गए थे। अब BNSS लागू है, इसलिए इन फैसलों में बताए गए कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान कानून के संबंधित प्रावधानों के साथ समझना चाहिए।
पुलिस दूसरे राज्य की घटना बताकर FIR दर्ज करने से मना करे तो क्या करें?
यदि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो केवल घटना दूसरे जिले या राज्य में होने के आधार पर पुलिस सूचना दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती। हालांकि, BNSS की धारा 173(3) के अंतर्गत कुछ निर्धारित अपराधों में कानूनी शर्तें पूरी होने पर प्रारंभिक जांच की जा सकती है।
धारा 173(3) के अनुसार तीन वर्ष या उससे अधिक, लेकिन सात वर्ष से कम कारावास से दंडनीय संज्ञेय अपराधों में थाना प्रभारी, अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, पुलिस उपाधीक्षक से कम रैंक के न होने वाले अधिकारी की पूर्व अनुमति से 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच कर सकता है। इसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि मामले में आगे कार्रवाई के लिए प्रथमदृष्टया आधार मौजूद है या नहीं। यह प्रावधान केवल क्षेत्राधिकार का हवाला देकर शिकायत अस्वीकार करने की अनुमति नहीं देता।
यदि थाना प्रभारी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो शिकायतकर्ता BNSS की धारा 173(4) के अंतर्गत संबंधित पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत डाक से भेज सकता है। पुलिस अधीक्षक को संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर स्वयं जांच करने या अधीनस्थ पुलिस अधिकारी से जांच कराने की शक्ति प्राप्त है। इस उपाय से राहत न मिलने पर लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया जा सकता है।
इस दौरान मूल शिकायत, डाक की रसीद और पुलिस से प्राप्त जवाब सुरक्षित रखें। FIR दर्ज न होने पर उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाते समय ये दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
- दूसरे जिले या राज्य में हुए संज्ञेय अपराध की सूचना अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में भी दी जा सकती है।
- घटना वाले क्षेत्र के संबंधित पुलिस थाने में सीधे FIR दर्ज कराना भी एक विकल्प है।
- FIR दर्ज करने, पुलिस जांच और न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई का क्षेत्राधिकार अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
- अपराध कई स्थानों पर हुआ हो, तो जांच और विचारण का क्षेत्राधिकार अपराध के वास्तविक तथ्यों और लागू कानून के अनुसार निर्धारित होगा।
- FIR दूसरे राज्य में भेजे जाने पर संबंधित पुलिस थाने, जांच अधिकारी और उपलब्ध स्थानांतरण विवरण का रिकॉर्ड रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या दूसरे राज्य की घटना की FIR अपने जिले में दर्ज हो सकती है?
हां। BNSS की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना घटना के स्थान की परवाह किए बिना पुलिस थाने में दी जा सकती है।
क्या दूसरे राज्य में FIR दर्ज कराने के लिए वहां जाना जरूरी है?
नहीं। केवल FIR दर्ज कराने के लिए घटना वाले राज्य में जाना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, आगे की जांच में मामले की परिस्थितियों और कानून के अनुसार सहयोग करना पड़ सकता है।
क्या FIR दर्ज करने वाला थाना ही पूरी जांच करेगा?
आवश्यक नहीं। FIR दर्ज करने के बाद क्षेत्राधिकार और अपराध के तथ्यों के अनुसार मामला दूसरे पुलिस थाने को भेजा जा सकता है।
यदि अपराध कई राज्यों में हुआ है, तो क्षेत्राधिकार कैसे तय होगा?
अपराध की प्रकृति, उसके आवश्यक कानूनी तत्वों, विभिन्न स्थानों पर हुई घटनाओं और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर जांच तथा विचारण का क्षेत्राधिकार निर्धारित होगा।
क्या FIR दूसरे राज्य में भेजे जाने पर शिकायतकर्ता को दोबारा FIR दर्ज करानी होगी?
सामान्यतः नहीं। FIR के स्थानांतरण पर संबंधित पुलिस थाना अपने रिकॉर्ड में आवश्यक प्रविष्टियां करता है। केवल स्थानांतरण के कारण शिकायतकर्ता को उसी घटना की नई स्वतंत्र FIR दर्ज कराने की आवश्यकता सामान्यतः नहीं होती।
निष्कर्ष
दूसरे जिले या राज्य में संज्ञेय अपराध होने पर शिकायतकर्ता घटना वाले क्षेत्र के पुलिस थाने के साथ-साथ अपने वर्तमान स्थान के पुलिस थाने में भी सूचना दे सकता है। केवल क्षेत्राधिकार के कारण अपराध की सूचना देने में देरी नहीं करनी चाहिए।
FIR दर्ज होने के बाद आगे की जांच किस पुलिस थाने द्वारा की जाएगी, यह अपराध के वास्तविक तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा। इसलिए घटना का स्पष्ट विवरण, उपलब्ध साक्ष्य और स्थान संबंधी सही जानकारी देना महत्वपूर्ण है।