भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना और प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report – FIR) दर्ज करने से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है। इसमें बताया गया है कि पुलिस को अपराध की सूचना कैसे दी जा सकती है, उसे दर्ज करते समय किन नियमों का पालन करना होता है और सूचना देने वाले व्यक्ति तथा पीड़ित को कौन-से अधिकार मिलते हैं।

धारा 173 केवल FIR दर्ज करने के तरीके तक सीमित नहीं है। इसमें कुछ विशेष अपराधों के पीड़ितों की सुरक्षा, दर्ज FIR की निःशुल्क प्रति, कुछ मामलों में प्रारंभिक जाँच और पुलिस द्वारा सूचना दर्ज करने से इनकार करने पर कानूनी उपाय भी शामिल हैं। इन सभी व्यवस्थाओं की अलग-अलग शर्तें हैं।

धारा 173 का संक्षिप्त परिचय

कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

अध्याय: XIII — पुलिस को सूचना और जाँच संबंधी शक्तियाँ

विषय: संज्ञेय मामलों की सूचना और FIR

लागू होने की तारीख: 1 जुलाई 2024

पुराना संबंधित प्रावधान: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154

मूल अधिनियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 173 : संज्ञेय मामलों में सूचना

173. (1) संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक सूचना, उस क्षेत्र पर विचार किए बिना जहां अपराध किया गया है, मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संसूचना द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को दी जा सकेगी और यदि,—

(i) मौखिक रूप से दी गई है, तो उसके द्वारा या उसके निदेश के अधीन लेखबद्ध की जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी सूचना पर, चाहे वह लिखित रूप में दी गई हो या पूर्वोक्त रूप में लेखबद्ध की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे ;

(ii) यदि इलेक्ट्रॉनिक संसूचना द्वारा दी गई है, तो उसे देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर हस्ताक्षरित किए जाने पर उसके द्वारा अभिलेख पर ली जाएगी,

और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जाएगी, जिसे राज्य सरकार, इस निमित्त नियमों द्वारा विहित करे, प्रविष्ट किया जाएगा :

परंतु यदि किसी महिला द्वारा, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, या धारा 124 के अधीन किसी अपराध के किए जाने या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, कोई सूचना दी जाती है तो ऐसी सूचना किसी महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित की जाएगी :

परन्तु यह और कि—

(क) यदि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124 के अधीन किसी अपराध के किए जाने का या किए जाने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग है, तो ऐसी सूचना किसी पुलिस अधिकारी द्वारा उस व्यक्ति के, जो ऐसे अपराध की रिपोर्ट करने की वांछा करता है, निवास-स्थान पर या उस व्यक्ति के विकल्प के किसी सुगम स्थान पर, यथास्थिति, किसी दुभाषिए या किसी विशेष शिक्षक की उपस्थिति में अभिलिखित की जाएगी ;

(ख) ऐसी सूचना के अभिलेखन की वीडियो फिल्म तैयार की जाएगी ;

(ग) पुलिस अधिकारी धारा 183 की उपधारा (6) के खंड (क) के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उस व्यक्ति का कथन यथासंभवशीघ्र अभिलिखित कराएगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अभिलिखित सूचना की प्रतिलिपि, सूचना देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी ।

(3) धारा 175 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे किसी संज्ञेय अपराध को करने से संबंधित सूचना की प्राप्ति पर, जिसमें तीन वर्ष या उससे अधिक का दंड है किन्तु सात वर्ष से कम का है, थाने का भारसाधक अधिकारी अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करते हुए उप-पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अन्यून किसी अधिकारी से प्राप्त पूर्व अनुमति से,—

(i) यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या चौदह दिन की अवधि के भीतर मामले में कार्यवाही के लिए कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, आरंभिक जांच करने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ; या

(ii) जब कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है, तब अन्वेषण के लिए कार्यवाही करेगा ।

(4) कोई व्यक्ति, जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सूचना को अभिलिखित करने से इंकार करने से व्यथित है ऐसी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है जो, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना से किसी संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है तो, या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस संहिता द्वारा उपबंधित रीति में अन्वेषण किए जाने का निदेश देगा और उस अधिकारी को उस अपराध के संबंध में पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी की सभी शक्तियां होंगी ; जिसके न हो सकने पर, ऐसा व्यथित व्यक्ति, मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकेगा ।

स्रोत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, धारा 173 — भारत सरकार

BNSS धारा 173 का कानूनी अर्थ क्या है?

धारा 173 का मुख्य विषय संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करना (Recording of Information) है। ऐसी सूचना मिलने पर पुलिस को उसे लिखित रूप में दर्ज करने, आवश्यक हस्ताक्षर लेने और निर्धारित रिकॉर्ड में उसका विवरण दर्ज करने जैसे कानूनी नियमों का पालन करना होता है। संज्ञेय अपराध की इस प्रकार दर्ज की गई सूचना ही सामान्यतः FIR कहलाती है।

इस धारा को समझते समय FIR दर्ज होने और अपराध सिद्ध होने के बीच अंतर रखना आवश्यक है। FIR में किसी घटना का उल्लेख होने से आरोप अपने आप साबित नहीं हो जाते। इसी प्रकार FIR दर्ज होने मात्र से गिरफ्तारी जरूरी नहीं हो जाती। पुलिस जाँच (Investigation), गिरफ्तारी और अदालत में मुकदमा चलाने के लिए कानून में अलग प्रावधान हैं।

धारा 173 की चार उपधाराएँ (Sub-sections) अलग-अलग कानूनी विषयों से संबंधित हैं। उपधारा (1) अपराध की सूचना दर्ज करने के नियम बताती है। उपधारा (2) दर्ज सूचना की निःशुल्क प्रति देने से संबंधित है। उपधारा (3) कुछ अपराधों में प्रारंभिक जाँच की व्यवस्था करती है और उपधारा (4) पुलिस द्वारा सूचना दर्ज करने से इनकार करने की स्थिति में कानूनी उपाय बताती है।

महत्वपूर्ण कानूनी अंतर

धारा 173 संज्ञेय अपराध की सूचना से संबंधित है। असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offence) की सूचना के लिए BNSS की धारा 174 में अलग व्यवस्था है। दोनों प्रकार के अपराधों में पुलिस की शक्तियाँ और लागू नियम अलग हो सकते हैं।

धारा 173(1): संज्ञेय अपराध की सूचना और FIR दर्ज करने के नियम

धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना थाना प्रभारी को मौखिक रूप में या इलेक्ट्रॉनिक संचार (Electronic Communication) के माध्यम से दी जा सकती है। कानून स्पष्ट करता है कि सूचना देने के लिए घटना का उसी पुलिस थाने के क्षेत्र में होना जरूरी नहीं है।

इस प्रावधान के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना उस पुलिस थाने में भी दी जा सकती है, जिसके क्षेत्र में घटना नहीं हुई है। इसे Zero FIR कहा जाता है। हालाँकि FIR दर्ज करना और मामले की आगे जाँच करना अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं।

मौखिक सूचना के लिए क्या नियम हैं?

धारा 173(1)(i) के अनुसार मौखिक सूचना मिलने पर थाना प्रभारी उसे स्वयं लिखित रूप में दर्ज करेगा या अपने निर्देश पर लिखवाएगा। इसके बाद लिखी गई सूचना सूचना देने वाले व्यक्ति (Informant) को पढ़कर सुनाई जाएगी और उसके हस्ताक्षर लिए जाएँगे।

यहाँ तीन बातें जरूरी हैं—सूचना को लिखना, उसे पढ़कर सुनाना और सूचना देने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर लेना। पढ़कर सुनाने से व्यक्ति यह जान सकता है कि पुलिस ने उसकी बताई हुई घटना सही तरीके से दर्ज की है या नहीं। हस्ताक्षर से यह स्पष्ट होता है कि दर्ज विवरण उसी व्यक्ति द्वारा दी गई सूचना से संबंधित है।

यदि सूचना पहले से लिखित रूप में दी गई है, तब भी उस पर सूचना देने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर आवश्यक हैं। इसलिए पुलिस को केवल घटना बता देना और उसे धारा 173 के अनुसार FIR के रूप में दर्ज करना एक ही बात नहीं है।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्राप्त सूचना

धारा 173(1)(ii) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्राप्त सूचना के लिए विशेष नियम बताती है। ऐसी सूचना देने वाले व्यक्ति को तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर करने होते हैं, जिसके बाद उसे निर्धारित रिकॉर्ड में लिया जाता है।

तीन दिन की यह अवधि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गई सूचना पर हस्ताक्षर करने की शर्त से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक संज्ञेय अपराध की FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को सामान्य रूप से तीन दिन तक प्रतीक्षा करने का अधिकार है।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गई सूचना को रिकॉर्ड में लेने के लिए तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर आवश्यक हैं। यह शर्त इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से FIR दर्ज करने की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निर्धारित रिकॉर्ड में सूचना का विवरण दर्ज करना

उपधारा (1) के अनुसार सूचना का सार ऐसी निर्धारित पुस्तक या रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा, जिसका प्रारूप राज्य सरकार अपने नियमों के अनुसार तय कर सकती है। इसका उद्देश्य अपराध की सूचना को पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाना है।

BNSS सूचना दर्ज करने के मुख्य कानूनी नियम तय करती है, जबकि संबंधित रजिस्टर का प्रारूप राज्य सरकार के लागू नियमों के अनुसार हो सकता है।

कुछ विशेष अपराधों की महिला पीड़ित के लिए नियम

धारा 173(1) का पहला परंतुक (Proviso), यानी मुख्य प्रावधान के साथ जोड़ा गया विशेष नियम, कुछ अपराधों की महिला पीड़ित के लिए अलग व्यवस्था करता है। यदि किसी महिला के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 या 124 के अंतर्गत अपराध किए जाने या उसका प्रयास होने का आरोप है, तो उसकी सूचना महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जाएगी।

यह विशेष नियम कानून में बताई गई अपराधों की श्रेणियों पर लागू होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि महिला द्वारा दी गई हर प्रकार की FIR केवल महिला अधिकारी ही दर्ज कर सकती है। यह देखना जरूरी है कि मामला उन अपराधों में शामिल है या नहीं जिनका उल्लेख इस प्रावधान में किया गया है।

दिव्यांग पीड़ित व्यक्ति के लिए अतिरिक्त सुरक्षा

धारा 173(1) का दूसरा परंतुक ऊपर बताए गए विशेष अपराधों के मामले में ऐसे पीड़ित व्यक्ति के लिए अतिरिक्त सुरक्षा देता है, जिसे अस्थायी या स्थायी मानसिक अथवा शारीरिक दिव्यांगता है। इस प्रावधान में व्यक्ति शब्द का उपयोग किया गया है, इसलिए इसे केवल महिला पीड़ित तक सीमित नहीं समझना चाहिए।

ऐसी स्थिति में पुलिस अधिकारी सूचना देने वाले व्यक्ति के घर या उसकी पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर सूचना दर्ज करेगा। आवश्यकता होने पर दुभाषिए (Interpreter), यानी भाषा समझाने वाले व्यक्ति, या विशेष शिक्षक (Special Educator) की सहायता भी ली जाएगी।

कानून सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग (Videography) भी आवश्यक करता है। इसके अलावा पुलिस अधिकारी को धारा 183(6)(a) के अनुसार संबंधित व्यक्ति का बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) से जल्द से जल्द दर्ज कराने की व्यवस्था करनी होती है।

दोनों विशेष नियमों में अंतर

पहला परंतुक कुछ विशेष अपराधों की महिला पीड़ित की सूचना महिला अधिकारी द्वारा दर्ज करने से संबंधित है। दूसरा परंतुक उन्हीं अपराधों के मामले में मानसिक या शारीरिक दिव्यांगता वाले पीड़ित व्यक्ति के लिए सुविधाजनक स्थान, जरूरी सहायता, वीडियो रिकॉर्डिंग और मजिस्ट्रेट के सामने बयान की अतिरिक्त व्यवस्था करता है। दोनों के लागू होने की शर्तें अलग हैं।

धारा 173(2): दर्ज FIR की निःशुल्क प्रति का अधिकार

धारा 173(2) के अनुसार उपधारा (1) के अंतर्गत दर्ज सूचना की प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित को तत्काल और निःशुल्क दी जाएगी। यह पुलिस की ओर से दी जाने वाली कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि कानून में दिया गया अधिकार है।

इस प्रावधान में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं—प्रति तुरंत दी जाए, उसके लिए कोई शुल्क न लिया जाए और यह अधिकार सूचना देने वाले व्यक्ति के साथ-साथ पीड़ित को भी मिले।

सूचना देने वाला व्यक्ति और पीड़ित हमेशा एक ही व्यक्ति नहीं होते। किसी घटना की जानकारी पुलिस को पीड़ित के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति भी दे सकता है। इसलिए FIR की निःशुल्क प्रति पाने का अधिकार केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जिसने सबसे पहले पुलिस को सूचना दी थी।

धारा 173(2) का सार

धारा 173(1) के अंतर्गत दर्ज सूचना की प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित को तत्काल और बिना किसी शुल्क के दी जाएगी।

FIR दर्ज होने के बाद सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित को उसकी प्रति तत्काल और निःशुल्क मिलनी चाहिए। यदि उस समय प्रति नहीं मिलती है, तो FIR की कॉपी प्राप्त करने के अन्य तरीके भी अपनाए जा सकते हैं।

धारा 173(3): प्रारंभिक जाँच संबंधी कानूनी व्यवस्था

धारा 173(3) कुछ संज्ञेय अपराधों में प्रारंभिक जाँच (Preliminary Enquiry) की अनुमति देती है। यह व्यवस्था धारा 175 के नियमों को प्रभावित किए बिना लागू होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस हर संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जाँच कर सकती है।

यह उपधारा ऐसे संज्ञेय अपराधों से संबंधित है जिनके लिए कानून में तीन वर्ष या उससे अधिक, लेकिन सात वर्ष से कम कारावास की सजा निर्धारित है। यहाँ सजा की सीमा से मतलब अपराध के लिए कानून में तय सजा से है, न कि किसी विशेष मामले में अदालत द्वारा अंत में सुनाई जाने वाली सजा से।

वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति

इस उपधारा के अनुसार थाना प्रभारी को अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करना होता है। इसके साथ ही उप पुलिस अधीक्षक (Deputy Superintendent of Police – DSP) या उससे वरिष्ठ अधिकारी की पहले से अनुमति (Prior Permission) आवश्यक है।

इसलिए केवल अपराध की सजा इस उपधारा की सीमा में आने से प्रारंभिक जाँच अपने आप जरूरी नहीं हो जाती। वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति और मामले की प्रकृति तथा गंभीरता भी महत्वपूर्ण हैं।

चौदह दिन की अवधि किसके लिए है?

धारा 173(3)(i) के अनुसार प्रारंभिक जाँच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि मामले में आगे कार्रवाई करने के लिए पहली नजर में पर्याप्त आधार (Prima Facie Case) मौजूद है या नहीं। ऐसी प्रारंभिक जाँच के लिए चौदह दिन की अवधि निर्धारित है।

धारा 173(3)(ii) में दूसरा विकल्प भी दिया गया है। यदि पहली नजर में अपराध का मामला बनता है, तो पुलिस जाँच आगे बढ़ाई जा सकती है। इसलिए चौदह दिन को प्रत्येक संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करने या पुलिस जाँच शुरू करने से पहले की जरूरी प्रतीक्षा अवधि नहीं समझना चाहिए।

प्रारंभिक जाँच की सीमा

धारा 173(3) में प्रारंभिक जाँच की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। जहाँ किसी विशेष कानून में प्रारंभिक जाँच पर अलग प्रतिबंध है, वहाँ केवल इस उपधारा के आधार पर प्रारंभिक जाँच करने का अधिकार नहीं माना जा सकता।

हर संज्ञेय अपराध में प्रारंभिक जाँच नहीं की जा सकती। प्रारंभिक जाँच कब की जा सकती है, यह अपराध के लिए निर्धारित सजा, लागू कानून और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

धारा 173(4): पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करे तो क्या प्रावधान है?

धारा 173(4) उस स्थिति के लिए है जब थाना प्रभारी उपधारा (1) के अंतर्गत दी गई संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करता है। ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति घटना की मुख्य जानकारी लिखित रूप में डाक द्वारा संबंधित पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police – SP) को भेज सकता है।

यदि पुलिस अधीक्षक को लगता है कि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का मामला बनता है, तो वह स्वयं मामले की जाँच करेगा या अपने अधीन काम करने वाले किसी पुलिस अधिकारी को जाँच करने का निर्देश देगा।

जिस पुलिस अधिकारी को इस प्रकार जाँच सौंपी जाती है, उसे संबंधित अपराध की जाँच के लिए थाना प्रभारी की शक्तियाँ मिलती हैं। इसका अर्थ है कि पुलिस अधीक्षक की भूमिका केवल शिकायत प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। वह कानून के अनुसार मामले की जाँच कराने का निर्देश भी दे सकता है।

इस उपधारा में प्रभावित व्यक्ति के लिए मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन करने का प्रावधान भी है। हालाँकि ऐसा आवेदन कैसे किया जाएगा और मजिस्ट्रेट किन शर्तों पर पुलिस जाँच का आदेश दे सकता है, यह संबंधित अन्य कानूनी प्रावधानों के अनुसार तय होता है।

इस उपधारा का वास्तविक प्रभाव

यदि थाना प्रभारी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो प्रभावित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक को लिखित सूचना भेज सकता है। सूचना से संज्ञेय अपराध का मामला बनने पर पुलिस अधीक्षक स्वयं जाँच कर सकता है या किसी अधीनस्थ अधिकारी से जाँच करवा सकता है। इसके बाद कानून में मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन करने की व्यवस्था भी है।

यदि पुलिस संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करती है, तो FIR दर्ज न होने पर उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा लिया जा सकता है।

धारा 173(4) के अनुसार ऐसी स्थिति में पुलिस अधीक्षक को लिखित सूचना डाक से भेजी जा सकती है। पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजते समय घटना और पुलिस द्वारा सूचना दर्ज न किए जाने का विवरण स्पष्ट रूप से देना उपयोगी होता है।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

📌 एक नज़र में
  • FIR का कानूनी आधार: BNSS धारा 173 संज्ञेय अपराध की सूचना और FIR दर्ज करने के मुख्य नियम निर्धारित करती है।
  • सूचना का स्थान: संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी पुलिस थाने में दी जा सकती है, भले ही घटना उसके क्षेत्र में न हुई हो।
  • सूचना का माध्यम: मौखिक सूचना लिखकर पढ़कर सुनाई जाती है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक सूचना के लिए तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
  • विशेष सुरक्षा: कुछ विशेष अपराधों की महिला पीड़ित और मानसिक या शारीरिक दिव्यांगता वाले पीड़ित व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त नियम हैं।
  • FIR की निःशुल्क प्रति: दर्ज सूचना की प्रति सूचना देने वाले व्यक्ति या पीड़ित को तत्काल और बिना शुल्क दी जाएगी।
  • प्रारंभिक जाँच: तीन वर्ष या अधिक, लेकिन सात वर्ष से कम कारावास वाले संज्ञेय अपराधों में निर्धारित शर्तों के अनुसार प्रारंभिक जाँच की जा सकती है।
  • FIR दर्ज करने से इनकार: धारा 173(4) के अनुसार पुलिस अधीक्षक को लिखित सूचना डाक से भेजने और आगे मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन करने का प्रावधान है।

निष्कर्ष

BNSS धारा 173 संज्ञेय अपराध की सूचना और FIR दर्ज करने के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार है। इसमें सूचना देने के तरीके, पुलिस द्वारा उसे दर्ज करने के नियम, कुछ विशेष अपराधों के पीड़ितों की सुरक्षा और दर्ज FIR की निःशुल्क प्रति पाने का अधिकार शामिल है।

इसके अलावा यह धारा कुछ मामलों में प्रारंभिक जाँच की अनुमति देती है और पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने से इनकार करने पर कानूनी उपाय बताती है। इन सभी प्रावधानों को उनकी अलग-अलग शर्तों के अनुसार समझना जरूरी है।