किसी आपराधिक मामले में पुलिस जाँच पूरी होने के बाद Trial किस अदालत में चलेगा? क्या चोरी और हत्या के मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होती है? क्या अधिक सजा वाले सभी अपराध सीधे सत्र न्यायालय में जाते हैं? इन सवालों का जवाब अपराध की कानूनी धारा और उसके विचारण के लिए निर्धारित न्यायालय से मिलता है।

भारत में अपराधों के विचारण के लिए अलग-अलग श्रेणियों की अदालतें हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के अपराधों के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 21 और प्रथम अनुसूची महत्त्वपूर्ण हैं। वहीं NDPS Act, POCSO Act जैसे विशेष कानूनों में अदालत निर्धारित करने की अलग व्यवस्था हो सकती है। सही Trial Court पहचानने के लिए इन प्रावधानों को समझना जरूरी है।

किस अपराध का Trial किस Court में होगा, यह कैसे तय होता है?

किसी अपराध का Trial किस अदालत में होगा, इसकी शुरुआत उस अपराध पर लागू धारा से होती है। उदाहरण के लिए, सामान्य चोरी, घर में चोरी और चोरी करने के लिए हिंसा की तैयारी करना अलग कानूनी परिस्थितियाँ हैं। इनसे संबंधित धाराएँ और उनके लिए निर्धारित अदालतें एक जैसी हों, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए घटना का सामान्य नाम जानना पर्याप्त नहीं होता।

BNSS की धारा 21 अपराधों के विचारण के लिए सक्षम अदालतों का कानूनी आधार देती है। इसके अनुसार BNS के अपराधों का विचारण उच्च न्यायालय, सत्र न्यायालय या प्रथम अनुसूची में बताए गए अन्य न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। यह व्यवस्था BNSS के अन्य प्रावधानों के अधीन है।

व्यावहारिक रूप से किसी BNS अपराध के लिए सामान्य Trial Court की श्रेणी जानने का सबसे सीधा तरीका प्रथम अनुसूची देखना है। उसमें संबंधित अपराध के सामने Magistrate of the First Class, Any Magistrate या Court of Session जैसी प्रविष्टियाँ दी गई हैं।

Trial Court की विचारण-संबंधी क्षमता

किसी अपराध का Trial करने के लिए कानून द्वारा न्यायालय को प्राप्त अधिकार को उसकी विचारण-संबंधी क्षमता कहा जा सकता है। यह प्रश्न इस बात से अलग है कि अदालत किस स्थान पर स्थित है या किसी विशेष मामले को कौन-सा कोर्ट नंबर आवंटित हुआ है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी अपराध की प्रथम अनुसूची में Court of Session लिखा है, तो उससे उस अपराध के विचारण के लिए सत्र न्यायालय की निर्धारित श्रेणी का पता चलता है। लेकिन उस अपराध का मामला किस जिले में चलेगा, यह अलग कानूनी प्रश्न है। अदालत का क्षेत्राधिकार निर्धारित करते समय विचारण-संबंधी और क्षेत्रीय पहलुओं को अलग-अलग समझना पड़ता है।

BNSS की प्रथम अनुसूची से Trial Court कैसे पहचानें?

BNSS की प्रथम अनुसूची (First Schedule) अपराधों के वर्गीकरण की तालिका है। इसमें अपराध के लिए निर्धारित सजा, उसकी संज्ञेय या असंज्ञेय स्थिति, जमानतीय या गैर-जमानतीय स्थिति और विचारण करने वाली अदालत का विवरण मिलता है। Trial Court पहचानने के लिए इसका अंतिम कॉलम विशेष महत्त्व रखता है।

प्रथम अनुसूची दो भागों में विभाजित है। पहला भाग BNS के अपराधों से संबंधित है। दूसरा भाग अन्य कानूनों के अपराधों का सामान्य वर्गीकरण देता है। दोनों भागों का उपयोग अलग तरीके से होता है।

Part I: BNS के अपराधों के लिए अदालत कैसे देखें?

प्रथम भाग में BNS की धाराओं के अनुसार प्रविष्टियाँ दी गई हैं। इसकी तालिका में छह कॉलम होते हैं।

  1. Section: BNS की संबंधित धारा या उपधारा।
  2. Offence: अपराध का संक्षिप्त विवरण।
  3. Punishment: उस अपराध के लिए निर्धारित सजा का संक्षिप्त उल्लेख।
  4. Cognizable or Non-cognizable: अपराध का संज्ञेय या असंज्ञेय वर्गीकरण।
  5. Bailable or Non-bailable: जमानत से संबंधित वर्गीकरण।
  6. By what Court triable: अपराध का विचारण करने वाली अदालत की श्रेणी।

यदि किसी मामले में BNS धारा 318(4) लागू है, तो प्रथम अनुसूची में उसी उपधारा की प्रविष्टि देखनी होगी। केवल धारा 318 पढ़कर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसके अंतर्गत अलग प्रकार की धोखाधड़ी के लिए अलग प्रविष्टियाँ मौजूद हैं।

इसी प्रकार किसी धारा के अंतर्गत अपराध की परिस्थितियों के आधार पर अलग प्रविष्टियाँ हो सकती हैं। ऐसे में सही उपधारा और उससे संबंधित विवरण पढ़ना आवश्यक है।

प्रथम अनुसूची की प्रविष्टि पूरी कानूनी परिभाषा नहीं है

प्रथम अनुसूची में अपराध और सजा का संक्षिप्त विवरण दिया जाता है। किसी अपराध के आवश्यक तत्व, अपवाद और वास्तविक दंड प्रावधान समझने के लिए BNS की मूल धारा पढ़नी चाहिए। अनुसूची का उपयोग अपराध की विचारणीयता पहचानने के लिए किया जाता है।

Part II: अन्य कानूनों के अपराधों के लिए अदालत कैसे पहचानें?

प्रथम अनुसूची का दूसरा भाग उन अपराधों से संबंधित है जो BNS के बजाय किसी अन्य कानून के अंतर्गत आते हैं। लेकिन यहाँ सबसे पहले संबंधित कानून को देखना होगा। यदि उस कानून में स्वयं Trial Court निर्धारित है, तो वही विशेष व्यवस्था लागू होगी।

जब दूसरे कानून में सक्षम अदालत का अलग उल्लेख नहीं मिलता, तब BNSS धारा 21(b) और प्रथम अनुसूची का दूसरा भाग प्रासंगिक होता है। इसमें अपराध की अधिकतम सजा के आधार पर सामान्य वर्गीकरण दिया गया है।

अन्य कानून के अपराध की सजा प्रथम अनुसूची Part II में अदालत
मृत्युदंड, आजीवन कारावास या सात वर्ष से अधिक कारावास Court of Session
तीन वर्ष या उससे अधिक, लेकिन सात वर्ष से अधिक नहीं Magistrate of the First Class
तीन वर्ष से कम कारावास या केवल जुर्माना Any Magistrate

इस तालिका को BNS के सभी अपराधों पर सीधे लागू नहीं करना चाहिए। BNS के लिए प्रथम अनुसूची के पहले भाग में अपराध-विशिष्ट प्रविष्टियाँ हैं। दूसरे भाग का वर्गीकरण अन्य कानूनों के उन अपराधों के लिए उपयोगी है जिनके विचारण के संबंध में अलग वैधानिक व्यवस्था नहीं दी गई है।

यदि किसी विशेष कानून में अलग अदालत या विशेष प्रक्रिया निर्धारित है, तो केवल सजा की अवधि के आधार पर Part II की सामान्य तालिका लागू करके निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

किन अपराधों का Trial मजिस्ट्रेट न्यायालय में होता है?

कई आपराधिक अपराध न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होते हैं। इनमें ऐसे अपराध भी शामिल हो सकते हैं जिनके लिए कई वर्षों के कारावास का प्रावधान है। इसलिए मजिस्ट्रेट न्यायालय को केवल बहुत कम सजा वाले अपराधों की अदालत समझना सही नहीं होगा।

BNSS की प्रथम अनुसूची में मजिस्ट्रेट न्यायालय से संबंधित अलग-अलग प्रविष्टियाँ मिलती हैं। प्रत्येक प्रविष्टि का अपना कानूनी महत्त्व है।

Magistrate of the First Class

इस प्रविष्टि का अर्थ है कि संबंधित अपराध प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। उदाहरण के लिए, BNS धारा 318(4) के अंतर्गत धोखाधड़ी करके किसी व्यक्ति से संपत्ति दिलवाने जैसे अपराध की प्रथम अनुसूची में Magistrate of the First Class प्रविष्टि है।

यहाँ अपराध के नाम से अधिक महत्त्व उसकी विशिष्ट धारा का है। BNS धारा 318(2) की सामान्य धोखाधड़ी और धारा 318(4) की संपत्ति दिलवाने से संबंधित धोखाधड़ी की प्रविष्टियाँ एक जैसी नहीं हैं।

Any Magistrate

कुछ अपराधों के सामने Any Magistrate लिखा होता है। इसका अर्थ किसी भी प्रशासनिक अधिकारी या कार्यपालक मजिस्ट्रेट से नहीं है। प्रथम अनुसूची के स्पष्टीकरण के अनुसार इस अभिव्यक्ति में Executive Magistrate शामिल नहीं है।

उदाहरण के लिए, BNS धारा 303(2) के अंतर्गत सामान्य चोरी की प्रविष्टि में Any Magistrate दिया गया है। BNS धारा 303(2) के अंतर्गत Snatching के लिए भी यही प्रविष्टि मिलती है।

Any Magistrate की प्रविष्टि पढ़ते समय न्यायिक मजिस्ट्रेट की वैधानिक क्षमता और संबंधित न्यायिक व्यवस्था को ध्यान में रखना होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी जिले का कोई भी मजिस्ट्रेट बिना अन्य कानूनी शर्तों के उस मामले का Trial कर सकता है।

Magistrate of the Second Class

प्रथम अनुसूची में जहाँ द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट की प्रविष्टि हो, वहाँ उस श्रेणी की विचारण-संबंधी क्षमता को देखना होगा। यह प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट से अलग न्यायिक श्रेणी है।

BNSS में दोनों श्रेणियों की दंड देने की शक्तियाँ भी अलग निर्धारित हैं। लेकिन किसी अपराध के लिए अदालत की श्रेणी पहचानते समय उसकी अनुसूची प्रविष्टि और संबंधित वैधानिक शक्तियों को साथ समझना चाहिए।

उदाहरण से अंतर समझें

BNS धारा 303(2) में सामान्य चोरी के लिए Any Magistrate की प्रविष्टि है, जबकि BNS धारा 318(4) में संपत्ति दिलवाने से संबंधित धोखाधड़ी के लिए Magistrate of the First Class लिखा है। दोनों अपराध मजिस्ट्रेट न्यायालय से संबंधित हैं, लेकिन अनुसूची में उनकी प्रविष्टियाँ अलग हैं।

किन अपराधों का Trial सत्र न्यायालय में होता है?

कुछ अपराधों के लिए BNSS की प्रथम अनुसूची में Court of Session को विचारण करने वाली अदालत बताया गया है। हत्या, हत्या की श्रेणी में न आने वाला आपराधिक मानव वध और कुछ अन्य गंभीर अपराध इसके उदाहरण हैं।

सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध पहचानने का आधार केवल यह नहीं है कि अपराध गंभीर दिखाई देता है। संबंधित BNS धारा के सामने प्रथम अनुसूची में क्या लिखा है, यह देखना आवश्यक है।

हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के उदाहरण

BNS धारा 103(1) के अंतर्गत हत्या के अपराध की प्रथम अनुसूची में Court of Session दिया गया है। इसी प्रकार BNS धारा 105 के अंतर्गत हत्या की श्रेणी में न आने वाले आपराधिक मानव वध की संबंधित प्रविष्टियाँ भी Court of Session दर्शाती हैं।

इन अपराधों के लिए कानून ने सत्र न्यायालय की श्रेणी निर्धारित की है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे मामले की हर शुरुआती न्यायिक कार्यवाही सीधे सत्र न्यायालय में ही होगी। कुछ मामलों में प्रारंभिक कार्यवाही मजिस्ट्रेट के सामने होती है और बाद में मामला सत्र न्यायालय को भेजा जाता है।

मामला सत्र न्यायालय को भेजने की प्रक्रिया अलग कानूनी विषय है। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रारंभिक कार्यवाही किसी दूसरी अदालत में होने से अपराध के लिए निर्धारित Trial Court की श्रेणी अपने-आप नहीं बदलती।

कुछ अपराधों में महिला न्यायिक अधिकारी संबंधी प्रावधान

BNSS धारा 21 के परंतुक में BNS की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70 और 71 के अंतर्गत अपराधों के लिए विशेष व्यवस्था है। इन अपराधों का विचारण जहाँ तक व्यावहारिक हो, ऐसी अदालत द्वारा किया जाना चाहिए जिसकी अध्यक्षता महिला न्यायिक अधिकारी कर रही हो।

यहाँ 'जहाँ तक व्यावहारिक हो' (As far as practicable) शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। इसका अर्थ है कि महिला न्यायिक अधिकारी की उपलब्धता जैसी व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा सकता है। महिला न्यायिक अधिकारी उपलब्ध न होने मात्र से किसी अन्य सक्षम न्यायालय में विचारण स्वतः अवैध नहीं हो जाता।

BNSS धारा 21 का विशेष प्रावधान

BNS धारा 64 से 71 के अंतर्गत निर्दिष्ट अपराधों के विचारण में जहाँ तक व्यावहारिक हो, महिला न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता वाली अदालत का प्रावधान लागू होता है। यह व्यवस्था अपराध के लिए सक्षम अदालत निर्धारित करने वाले अन्य प्रावधानों के साथ पढ़ी जाती है।

क्या High Court भी किसी अपराध का Trial कर सकता है?

BNSS धारा 21(a) में BNS के अपराधों के संबंध में High Court का भी उल्लेख है। इसलिए कानूनी रूप से यह कहना अधूरा होगा कि प्रत्येक BNS अपराध का Trial केवल मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय ही कर सकता है।

हालाँकि सामान्य आपराधिक मामलों में अपराध के लिए निर्धारित Trial Court की पहचान प्रथम अनुसूची और लागू न्यायिक व्यवस्था के आधार पर की जाती है। उच्च न्यायालय की व्यापक वैधानिक क्षमता को किसी भी मामले के सामान्य रूप से सीधे High Court में Trial शुरू होने का नियम नहीं समझना चाहिए।

अलग-अलग अपराधों का Trial किस Court में होता है? उदाहरण

अपराध के अनुसार Trial Court का अंतर वास्तविक धाराओं से अधिक स्पष्ट होता है। नीचे BNS के कुछ अपराधों और BNSS की प्रथम अनुसूची में उनके सामने दी गई अदालतों के उदाहरण हैं। ये सामान्य विचारणीयता समझाने के लिए हैं; किसी वास्तविक मामले में अन्य लागू धाराओं और विशेष प्रावधानों की भी जाँच करनी होगी।

अपराध BNS धारा प्रथम अनुसूची में Trial Court
हत्या 103(1) Court of Session
हत्या की श्रेणी में न आने वाला आपराधिक मानव वध 105 Court of Session
दस वर्ष से कम आयु के बच्चे का उसके शरीर से वस्तु चुराने के उद्देश्य से अपहरण 97 Magistrate of the First Class
सामान्य चोरी 303(2) Any Magistrate
Snatching 304(2) Any Magistrate
घर, परिवहन के साधन या पूजा स्थल आदि में चोरी 305 Any Magistrate
सामान्य धोखाधड़ी 318(2) Any Magistrate
धोखाधड़ी करके संपत्ति दिलवाना 318(4) Magistrate of the First Class

इस तालिका से दो बातें सामने आती हैं। पहली, एक ही प्रकार के अपराध की अलग धाराओं के लिए अलग अदालत निर्धारित हो सकती है। दूसरी, केवल अधिकतम सजा देखकर अदालत तय करना भरोसेमंद तरीका नहीं है।

उदाहरण के लिए, BNS धारा 305 में सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है, फिर भी प्रथम अनुसूची में Any Magistrate लिखा है। दूसरी ओर, धारा 318(4) में भी सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है, लेकिन उसके सामने Magistrate of the First Class की प्रविष्टि है।

तालिका से क्या समझना चाहिए?

समान अधिकतम सजा वाले अपराधों की Trial Court प्रविष्टियाँ अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी अपराध की सजा और उसके लिए सक्षम अदालत के बीच सीधा, सार्वभौमिक संबंध मानना गलत होगा। सही उत्तर संबंधित धारा की प्रथम अनुसूची प्रविष्टि से मिलता है।

क्या अपराध की अधिकतम सजा से Trial Court तय होता है?

अपराध की अधिकतम सजा और उसका Trial करने वाली अदालत आपस में जुड़े हुए, लेकिन अलग कानूनी प्रश्न हैं। BNS के अपराधों के लिए प्रथम अनुसूची में संबंधित धारा के सामने दी गई अदालत देखनी होती है। वहीं दूसरे कानूनों के अपराधों में, यदि उस कानून ने अलग अदालत निर्धारित नहीं की है, तो प्रथम अनुसूची के Part II में सजा के आधार पर वर्गीकरण महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

इसलिए सात वर्ष तक की सजा वाला प्रत्येक अपराध एक ही श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होगा, ऐसा नियम नहीं है। BNS के अपराधों के उदाहरणों से यह अंतर स्पष्ट होता है।

Trial करने की शक्ति और सजा देने की शक्ति में अंतर

किसी अदालत को अपराध का विचारण करने का अधिकार होना और दोषसिद्धि के बाद कितनी सजा देने का अधिकार होना अलग बातें हैं। BNSS धारा 22 उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय की दंड देने की शक्तियों से संबंधित है, जबकि धारा 23 मजिस्ट्रेट की दंड देने की शक्तियाँ निर्धारित करती है।

BNSS धारा 23 के अनुसार सामान्य प्रथम श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रेट तीन वर्ष तक का कारावास दे सकता है। द्वितीय श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए कारावास की अधिकतम अवधि एक वर्ष है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सात वर्ष से अधिक कारावास की सजा नहीं दे सकता। संबंधित धाराओं में जुर्माने और अन्य दंडों के प्रावधान भी हैं।

यहाँ एक व्यावहारिक सवाल उठता है। यदि किसी अपराध के लिए कानून में सात वर्ष तक की सजा है, लेकिन उसकी प्रथम अनुसूची प्रविष्टि मजिस्ट्रेट न्यायालय बताती है, तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में अपराध की विचारणीयता और मजिस्ट्रेट की दंड देने की सीमा को अलग-अलग समझना होगा। BNSS में आवश्यकता पड़ने पर मामले को सक्षम उच्च न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजने से संबंधित प्रक्रियात्मक व्यवस्थाएँ भी हैं।

अदालत पहचानने में यह गलती न करें

किसी अपराध में निर्धारित अधिकतम सजा को देखकर सीधे यह निष्कर्ष न निकालें कि उसका Trial Sessions Court में ही होगा। पहले संबंधित अपराध की प्रथम अनुसूची प्रविष्टि देखें। अदालत की दंड देने की सीमा का प्रश्न उसके बाद अलग से समझें।

विशेष कानूनों के अपराध किस Court में चलते हैं?

भारत में अनेक अपराध BNS के बाहर अलग कानूनों में निर्धारित हैं। मादक पदार्थों, बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों, भ्रष्टाचार और कुछ अन्य विषयों के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों में अपराध के साथ-साथ उनके विचारण के लिए सक्षम अदालत की व्यवस्था भी हो सकती है।

BNSS धारा 21(b) इस संबंध में स्पष्ट आधार देती है। यदि किसी अन्य कानून में अपराध का Trial करने वाली अदालत निर्धारित है, तो उस कानून की व्यवस्था लागू होगी। जहाँ अदालत का अलग उल्लेख नहीं है, वहाँ BNSS की सामान्य व्यवस्था और प्रथम अनुसूची के दूसरे भाग को देखना होगा।

POCSO Act के अपराध

बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से संबंधित POCSO Act में विशेष न्यायालयों की व्यवस्था है। इसलिए ऐसे अपराध के लिए केवल BNS की किसी मिलती-जुलती धारा की Trial Court प्रविष्टि देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

यदि मामले में POCSO Act लागू है, तो उस कानून के अंतर्गत निर्धारित विशेष न्यायालय और संबंधित वैधानिक प्रावधानों की जाँच आवश्यक होगी।

NDPS Act के अपराध

NDPS Act में भी निर्दिष्ट अपराधों के विचारण के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था है। लेकिन सभी NDPS अपराधों की विचारणीयता के बारे में बिना संबंधित प्रावधान पढ़े एक ही सामान्य निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

अपराध की धारा, संबंधित कानून में दी गई न्यायालय-संबंधी व्यवस्था और लागू विशेष प्रावधान मिलाकर ही सक्षम अदालत पहचानी जाएगी।

भ्रष्टाचार से संबंधित अपराध

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) में निर्दिष्ट अपराधों के विचारण के लिए विशेष न्यायाधीश की व्यवस्था है। ऐसे मामलों में सामान्य मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय की प्रथम अनुसूची प्रविष्टि के बजाय संबंधित अधिनियम के प्रावधान महत्त्वपूर्ण होते हैं।

विशेष न्यायालय किसी कानून के अंतर्गत निर्धारित अपराधों का विचारण करने के लिए स्थापित या नामित किया जा सकता है। किस कानून में किस न्यायालय को यह अधिकार मिला है, इसका उत्तर उसी कानून और लागू अधिसूचनाओं से मिलता है।

यदि विशेष कानून में Trial Court का उल्लेख नहीं हो तो?

ऐसी स्थिति में BNSS धारा 21(b) और प्रथम अनुसूची के Part II को देखना होगा। इस भाग में अपराध के लिए निर्धारित सजा के आधार पर सामान्य न्यायालय वर्गीकरण दिया गया है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी अन्य कानून में अपराध के लिए पाँच वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है और उस कानून में सक्षम अदालत की अलग व्यवस्था नहीं है, तो प्रथम अनुसूची के Part II के अनुसार प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की श्रेणी प्रासंगिक होगी। लेकिन यह निष्कर्ष निकालने से पहले उस कानून में कोई अलग प्रावधान न होने की पुष्टि जरूरी है।

विशेष कानून पहले क्यों देखें?

किसी विशेष कानून में अपराध के Trial के लिए स्पष्ट न्यायालय निर्धारित हो, तो BNSS की सामान्य वर्गीकरण तालिका के आधार पर उसे बदलना सही नहीं होगा। पहले विशेष कानून की व्यवस्था देखें, उसके बाद जहाँ आवश्यक हो BNSS के सामान्य प्रावधान लागू करें।

एक मामले में कई अपराध हों तो सक्षम Trial Court कैसे पहचानें?

कई आपराधिक घटनाओं में एक से अधिक धाराएँ लागू होती हैं। उदाहरण के लिए, किसी घटना में चोरी के साथ मारपीट, धमकी या किसी अन्य अपराध का आरोप भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक धारा के लिए अलग-अलग विचारणीयता देखनी पड़ सकती है।

यदि एक अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है और दूसरा सत्र न्यायालय द्वारा, तो केवल पहली धारा के आधार पर पूरे मामले की अदालत तय करना सही नहीं होगा। यह देखना होगा कि संबंधित अपराधों का एक साथ Trial कानून के अनुसार संभव है या नहीं और ऐसी स्थिति में कौन-सी अदालत सक्षम होगी।

हालाँकि कई धाराएँ होने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि सभी अपराधों का Trial हमेशा एक ही अदालत में होगा। एक से अधिक आरोपों के संयुक्त Trial के लिए BNSS में अलग शर्तें हैं।

यदि किसी मामले में BNS के साथ POCSO Act या किसी अन्य विशेष कानून की धाराएँ भी हैं, तो संबंधित विशेष कानून की विचारण-संबंधी व्यवस्था भी महत्त्वपूर्ण होगी। इसलिए पूरे मामले की सक्षम अदालत पहचानते समय सभी लागू अपराधों और कानूनों को साथ देखना आवश्यक है।

व्यावहारिक स्थिति

मान लीजिए, किसी मामले में दो BNS धाराएँ लगी हैं। एक के सामने प्रथम अनुसूची में Any Magistrate लिखा है और दूसरी के सामने Court of Session। इस स्थिति में केवल पहली धारा देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पूरे मामले का Trial मजिस्ट्रेट न्यायालय में होगा। दोनों अपराधों की विचारणीयता और एक साथ Trial से संबंधित लागू प्रावधान देखने होंगे।

किसी अपराध के लिए सही Trial Court की पुष्टि कैसे करें?

कानून की तालिका से सक्षम अदालत की श्रेणी पहचानी जा सकती है, लेकिन किसी वास्तविक मामले में यह देखना भी जरूरी है कि वर्तमान में कौन-सी धाराएँ लागू हैं और मामला किस अदालत के सामने है। FIR में लिखी शुरुआती धाराएँ और बाद की न्यायिक कार्यवाही में विचाराधीन आरोप हमेशा एक जैसे नहीं रहते।

FIR और आरोपपत्र में धाराएँ अलग हों तो?

पुलिस जाँच के दौरान नई सामग्री मिलने पर अपराध की धाराओं में बदलाव हो सकता है। इसलिए केवल FIR की शुरुआती धाराओं के आधार पर वर्तमान Trial Court तय करना गलत हो सकता है। आरोपपत्र, उपलब्ध न्यायिक आदेश और मामले की वर्तमान अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, अदालत द्वारा आरोप निर्धारित किए जाने के बाद आरोपों की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। यदि आरोपों में बाद में वैधानिक रूप से परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव विचारण-संबंधी प्रश्नों पर भी पड़ सकता है।

कानून में सक्षम अदालत और वास्तविक आवंटित अदालत

प्रथम अनुसूची यह बताती है कि किसी अपराध का Trial किस श्रेणी की अदालत में हो सकता है। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि किसी जिले में मामला किस विशेष कोर्ट नंबर या न्यायिक अधिकारी के सामने लंबित है।

वास्तविक मामले की स्थिति जानने के लिए संबंधित न्यायालय के आदेश, केस रिकॉर्ड या उपलब्ध आधिकारिक केस विवरण देखना चाहिए। अदालत की श्रेणी और किसी विशेष न्यायालय को मामले का आवंटन अलग जानकारी है।

पुराने मामलों में कौन-सा कानून देखें?

BNS और BNSS 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इससे पहले हुए अपराधों और उस समय लंबित कार्यवाहियों में पुराने कानूनों की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। विशेष रूप से BNSS धारा 531 में लंबित जाँच, विचारण और अन्य निर्धारित कार्यवाहियों के लिए बचाव संबंधी प्रावधान हैं। इसलिए पुराने मामलों में केवल नई BNS धारा के आधार पर Trial Court निर्धारित करना सही नहीं होगा।

ऐसे मामले में अपराध की तारीख, कार्यवाही की स्थिति और उस पर लागू कानून की पुष्टि करनी होगी। यदि कोई कार्यवाही नए कानून लागू होने से पहले लंबित थी, तो उसके लिए पुरानी प्रक्रिया जारी रहने का प्रश्न उठ सकता है। वहीं बाद में शुरू हुई कार्यवाही पर कौन-सी प्रक्रिया लागू होगी, यह संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधानों के अनुसार तय होगा।

सही Trial Court पहचानने की व्यावहारिक जाँच
  • मामले में वर्तमान में लागू अपराध की धाराएँ देखें।
  • BNS के अपराधों के लिए प्रथम अनुसूची के Part I की संबंधित प्रविष्टि पढ़ें।
  • अन्य कानून के अपराधों में पहले उस कानून की अदालत-संबंधी व्यवस्था जाँचें।
  • जहाँ अलग अदालत निर्धारित नहीं है, वहाँ Part II और अन्य लागू प्रावधान देखें।
  • कई अपराध होने पर सभी धाराओं की विचारणीयता का मिलान करें।
  • मामले की वास्तविक अदालत जानने के लिए आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड देखें।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

एक नज़र में
  • किस अपराध का Trial किस अदालत में होगा, यह उसकी सही कानूनी धारा और लागू विचारण-संबंधी प्रावधानों से तय होता है।
  • BNS के अपराधों के लिए BNSS धारा 21 और प्रथम अनुसूची का Part I मुख्य संदर्भ हैं।
  • प्रथम अनुसूची के छठे कॉलम में अपराध का विचारण करने वाली अदालत की श्रेणी दी जाती है।
  • सामान्य चोरी और संपत्ति दिलवाने से संबंधित धोखाधड़ी जैसे अपराधों की Trial Court प्रविष्टियाँ अलग हो सकती हैं।
  • हत्या जैसे अपराधों के लिए प्रथम अनुसूची में Court of Session निर्धारित है।
  • केवल अधिकतम सजा देखकर BNS के किसी अपराध की Trial Court तय नहीं करनी चाहिए।
  • अन्य कानूनों के अपराधों में विशेष न्यायालय संबंधी प्रावधान पहले देखने होते हैं।
  • BNSS धारा 21 में BNS धारा 64 से 71 के निर्दिष्ट अपराधों के लिए जहाँ तक व्यावहारिक हो, महिला न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता वाली अदालत का प्रावधान है।
  • कानून में सक्षम अदालत की श्रेणी और वास्तविक मामले को आवंटित कोर्ट अलग बातें हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

चोरी का Trial किस Court में होता है?

BNS धारा 303(2) के अंतर्गत सामान्य चोरी की प्रथम अनुसूची प्रविष्टि Any Magistrate है। चोरी की अलग परिस्थितियों में अन्य धाराएँ लागू हो सकती हैं, इसलिए सही धारा की पुष्टि जरूरी है।

हत्या का Trial किस अदालत में होता है?

BNS धारा 103(1) के अंतर्गत हत्या के अपराध के लिए प्रथम अनुसूची में Court of Session निर्धारित है।

धोखाधड़ी का Trial किस Court में होता है?

यह लागू उपधारा पर निर्भर करता है। BNS धारा 318(2) की सामान्य धोखाधड़ी के लिए Any Magistrate और धारा 318(4) के लिए Magistrate of the First Class की प्रविष्टि है।

क्या सात वर्ष तक की सजा वाले सभी अपराध Sessions Court में चलते हैं?

नहीं। BNS के कई ऐसे अपराध हैं जिनमें सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन प्रथम अनुसूची में मजिस्ट्रेट न्यायालय की प्रविष्टि दी गई है।

क्या सभी गंभीर अपराधों का Trial Sessions Court में होता है?

गंभीर अपराधों में कई अपराध सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं, लेकिन केवल गंभीरता के सामान्य अनुमान से अदालत तय नहीं की जा सकती। संबंधित धारा और लागू कानून देखना होगा।

क्या POCSO और NDPS मामलों के लिए अलग अदालत होती है?

इन कानूनों में निर्दिष्ट अपराधों के विचारण के लिए विशेष न्यायालयों से संबंधित प्रावधान हैं। सही अदालत की पहचान संबंधित कानून, अपराध की धारा और लागू न्यायिक व्यवस्था से होती है।

क्या FIR में लगी धाराएँ बदलने पर Trial Court भी बदल सकता है?

धाराओं या आरोपों में बदलाव से सक्षम अदालत का प्रश्न प्रभावित हो सकता है। इसका परिणाम मामले की अवस्था और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

क्या Magistrate Court और Sessions Court की सजा देने की शक्ति समान है?

नहीं। BNSS धारा 22 और 23 में इन अदालतों की दंड देने की शक्तियों के लिए अलग प्रावधान हैं।

क्या BNSS की प्रथम अनुसूची से किसी मामले का कोर्ट नंबर पता चलता है?

नहीं। अनुसूची अपराध के लिए सक्षम अदालत की श्रेणी बताती है। वास्तविक कोर्ट नंबर और मामले की स्थिति संबंधित न्यायालय के रिकॉर्ड से पता चलती है।

क्या पुराने IPC मामलों में भी BNS की प्रथम अनुसूची देखनी चाहिए?

पुराने मामलों में अपराध की तारीख, लागू पुराने कानून और संक्रमणकालीन प्रावधान देखना जरूरी है। हर पुराने मामले में नई BNS धाराएँ सीधे लागू मानना सही नहीं होगा।

निष्कर्ष

किसी अपराध का Trial किस अदालत में होगा, यह जानने के लिए सबसे पहले उसकी सही कानूनी धारा पहचाननी होती है। BNS के अपराधों के लिए BNSS की प्रथम अनुसूची बताती है कि कौन-सा अपराध मजिस्ट्रेट न्यायालय में और कौन-सा सत्र न्यायालय में विचारणीय है। चोरी, धोखाधड़ी और हत्या जैसे अपराधों के उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि अदालत का निर्धारण केवल अपराध के नाम या अधिकतम सजा से नहीं किया जा सकता।

दूसरे कानूनों के अपराधों में स्थिति अलग हो सकती है। यदि संबंधित कानून ने विशेष अदालत निर्धारित की है, तो उसी व्यवस्था को देखना होगा। कई धाराओं वाले या पुराने मामलों में अतिरिक्त कानूनी प्रश्न भी सामने आ सकते हैं। इसलिए किसी वास्तविक मुकदमे के लिए सही अदालत जानने का आधार लागू धाराएँ, विचारण-संबंधी कानून और न्यायालय का वर्तमान रिकॉर्ड होना चाहिए।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। किसी वास्तविक मामले में सक्षम Trial Court का निर्धारण लागू धाराओं, विशेष कानूनों, न्यायिक आदेशों और मामले की अवस्था पर निर्भर कर सकता है। आवश्यक होने पर योग्य अधिवक्ता से सलाह लें।