भारत में साइबर अपराध के आँकड़े अलग-अलग सरकारी संस्थाओं की रिपोर्टों में प्रकाशित होते हैं। इनमें पुलिस द्वारा दर्ज आपराधिक मामले, ऑनलाइन प्राप्त शिकायतें, वित्तीय धोखाधड़ी की राशि और साइबर सुरक्षा घटनाएँ शामिल हो सकती हैं। इन सभी आँकड़ों का अर्थ एक जैसा नहीं होता। किसी वर्ष साइबर अपराध बढ़ने या किसी राज्य में अधिक मामले दर्ज होने का सही अर्थ निकालने के लिए आँकड़ों का स्रोत, रिपोर्टिंग अवधि, अपराध की श्रेणी और गणना की पद्धति देखना आवश्यक है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और अन्य सरकारी प्रणालियाँ अलग-अलग प्रकार की जानकारी उपलब्ध कराती हैं। इन आँकड़ों की तुलना से अपराधों की प्रवृत्ति का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन दर्ज मामलों की संख्या को देश में हुई सभी वास्तविक आपराधिक घटनाओं की संख्या नहीं माना जा सकता।

साइबर अपराध के आँकड़ों का अर्थ

साइबर अपराध के आँकड़े किसी निर्धारित अवधि में दर्ज अपराधों, प्राप्त शिकायतों और संबंधित कार्रवाई का संख्यात्मक विवरण होते हैं। इनका उपयोग अपराधों की संख्या, उनके वर्गीकरण, राज्यवार वितरण और समय के साथ होने वाले बदलाव का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।

यदि किसी वर्ष भारत में एक लाख साइबर अपराध दर्ज हुए, तो इसका अर्थ संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में एक लाख मामले दर्ज होना है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वास्तविक घटनाओं की संख्या भी इतनी ही थी। जिन घटनाओं की रिपोर्ट नहीं हुई या जो संबंधित अपराध श्रेणी में दर्ज नहीं हुईं, वे उस संख्या में शामिल नहीं होंगी।

महत्वपूर्ण तथ्य

दर्ज साइबर अपराध, ऑनलाइन शिकायत, पीड़ित व्यक्ति और साइबर सुरक्षा घटना अलग-अलग सांख्यिकीय इकाइयाँ हैं। इनके आँकड़ों को बिना परिभाषा और स्रोत जाँचे एक-दूसरे के बराबर नहीं माना जा सकता।

भारत में साइबर अपराध के आधिकारिक आँकड़ों के स्रोत

भारत में साइबर अपराध संबंधी जानकारी के प्रमुख सरकारी स्रोत राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) हैं। प्रत्येक संस्था का उद्देश्य और डेटा संग्रह करने की पद्धति अलग है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB)

NCRB की Crime in India रिपोर्ट पुलिस द्वारा दर्ज अपराधों का सांख्यिकीय विवरण प्रस्तुत करती है। इसमें राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अनुसार दर्ज मामलों, अपराध की विभिन्न श्रेणियों तथा अन्य संबंधित आँकड़ों की जानकारी मिलती है। साइबर अपराध के राष्ट्रीय और राज्यवार आँकड़ों की तुलना में यह प्रमुख आधिकारिक स्रोत है।

गृह मंत्रालय के 21 जुलाई 2026 के आधिकारिक उत्तर के अनुसार, उस समय NCRB की नवीनतम प्रकाशित Crime in India रिपोर्ट वर्ष 2024 की थी। इसमें 2020 से 2024 तक साइबर अपराध के राज्यवार और श्रेणीवार आँकड़े उपलब्ध कराए गए थे। यह जानकारी गृह मंत्रालय के आधिकारिक उत्तर में प्रकाशित की गई थी।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP)

NCRP नागरिकों से साइबर अपराध संबंधी ऑनलाइन शिकायतें प्राप्त करने का सरकारी माध्यम है। इस पोर्टल के आँकड़ों में प्राप्त शिकायतों की संख्या और उपलब्ध सरकारी विवरण के अनुसार उनसे संबंधित कार्रवाई की जानकारी मिल सकती है।

NCRP नागरिकों से साइबर अपराध संबंधी ऑनलाइन शिकायतें प्राप्त करने का सरकारी माध्यम है। इसके आँकड़े प्राप्त शिकायतों की संख्या दर्शाते हैं, जबकि पुलिस में दर्ज आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड अलग होता है। साइबर शिकायत का स्वरूप स्पष्ट होने पर इन दोनों प्रकार के आँकड़ों की तुलना करना आसान होता है।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C)

गृह मंत्रालय के अंतर्गत I4C साइबर अपराध से संबंधित विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय में भूमिका निभाता है। इसके अंतर्गत संचालित Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) से वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की शिकायतों, रिपोर्ट की गई धनराशि और उस धनराशि पर की गई कार्रवाई के आँकड़े उपलब्ध होते हैं।

CERT-In की साइबर सुरक्षा घटनाएँ

भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70B के अंतर्गत साइबर सुरक्षा घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाली राष्ट्रीय एजेंसी है। इसके रिकॉर्ड में तकनीकी सुरक्षा घटनाएँ शामिल होती हैं, जिनकी परिभाषा पुलिस में दर्ज साइबर अपराधों से अलग है।

सरकारी जानकारी के अनुसार वर्ष 2024 में CERT-In ने 20,41,360 साइबर सुरक्षा घटनाएँ रिपोर्ट या ट्रैक की थीं, जबकि उसी वर्ष NCRB में 1,01,928 साइबर अपराध दर्ज हुए। इन संख्याओं का अंतर यह नहीं बताता कि शेष घटनाओं पर FIR दर्ज नहीं हुई। दोनों संस्थाएँ अलग प्रकार की घटनाओं और रिकॉर्डों की गणना करती हैं।

आँकड़ों के स्रोत का अंतर

पुलिस में दर्ज अपराधों के लिए NCRB, ऑनलाइन शिकायतों के लिए NCRP, वित्तीय धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग के लिए CFCFRMS और तकनीकी साइबर सुरक्षा घटनाओं के लिए CERT-In के आँकड़े उपयोग किए जाते हैं। किसी भी तुलना में पहले यह तय करना आवश्यक है कि किस प्रकार के रिकॉर्ड का अध्ययन किया जा रहा है।

साइबर शिकायत, FIR और दर्ज अपराध की संख्या में अंतर

सरकारी आँकड़ों की तुलना में एक सामान्य गलती शिकायतों की संख्या को दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या मान लेना है। कोई व्यक्ति ऑनलाइन शिकायत प्रस्तुत कर सकता है, लेकिन प्रत्येक शिकायत स्वतः अलग FIR नहीं बनती। शिकायत की प्रकृति, उपलब्ध जानकारी और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार आगे कार्रवाई होती है।

एक ही घटना से संबंधित एक से अधिक शिकायतें प्राप्त हो सकती हैं। दूसरी ओर, किसी एक FIR में अनेक पीड़ित या कई संबंधित आपराधिक कृत्य शामिल हो सकते हैं। इसलिए शिकायतों, FIR और पीड़ित व्यक्तियों की संख्या में सीधा एक-से-एक संबंध होना आवश्यक नहीं है।

किसी साइबर अपराध की ऑनलाइन शिकायत और पुलिस द्वारा दर्ज FIR को एक ही रिकॉर्ड नहीं माना जा सकता। सामान्य पुलिस आवेदन, संज्ञेय अपराध की सूचना और मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कानूनी Complaint में भी अंतर होता है। यह भेद FIR और शिकायत के कानूनी अंतर में अधिक स्पष्ट होता है। आँकड़ों में प्रत्येक रिकॉर्ड की संख्या उसके वास्तविक स्वरूप के अनुसार पढ़ी जानी चाहिए।

शिकायत से FIR दर्ज होने का प्रतिशत

मान लीजिए किसी अवधि में 10,000 साइबर शिकायतें प्राप्त हुईं और उनमें से 2,000 शिकायतों पर FIR दर्ज हुई। ऐसी स्थिति में शिकायत से FIR दर्ज होने का प्रतिशत 20 होगा। यह गणना तभी सही मानी जाएगी, जब दोनों आँकड़े एक ही शिकायत समूह से संबंधित हों और प्रत्येक शिकायत की FIR से संबंधित स्थिति स्पष्ट हो।

यदि दर्ज FIR में पिछली अवधि की शिकायतें भी शामिल हों या एक FIR से अनेक शिकायतें संबंधित हों, तो केवल शिकायतों और FIR की कुल संख्या से वास्तविक प्रतिशत नहीं निकाला जा सकता। इसके अतिरिक्त, FIR दर्ज होने की कानूनी आवश्यकता प्रत्येक शिकायत की प्रकृति पर निर्भर करती है। इस संबंध में साइबर अपराध में FIR दर्ज होने की कानूनी स्थिति अलग से महत्वपूर्ण है। इसलिए इस प्रतिशत को अकेले पुलिस कार्रवाई की सफलता या विफलता का माप नहीं माना जा सकता।

भारत में साइबर अपराध के वर्षवार आँकड़े

गृह मंत्रालय द्वारा 21 जुलाई 2026 को प्रकाशित NCRB आधारित आँकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2020 से 2024 तक दर्ज साइबर अपराधों की संख्या लगातार बढ़ी। इस अवधि में दर्ज मामलों और पिछले वर्ष की तुलना में उनके प्रतिशत परिवर्तन का विवरण निम्नलिखित है।

वर्ष दर्ज मामले पिछले वर्ष से परिवर्तन
202050,035—
202152,974+5.87%
202265,893+24.39%
202386,420+31.15%
20241,01,928+17.95%

इस तालिका में मामलों की संख्या NCRB आधारित सरकारी आँकड़ों से ली गई है और प्रतिशत परिवर्तन संबंधित वर्षों की संख्या से गणना करके निकाला गया है। मूल संख्याएँ गृह मंत्रालय के 21 जुलाई 2026 के प्रकाशन में उपलब्ध हैं।

वर्ष 2024 में 2023 की तुलना में 15,508 अधिक मामले दर्ज हुए। लेकिन 2024 की प्रतिशत वृद्धि 2023 की प्रतिशत वृद्धि से कम रही। इसका अर्थ है कि दर्ज मामलों की संख्या बढ़ती रही, जबकि वृद्धि की प्रतिशत दर पिछले वर्ष की तुलना में कम हुई।

आँकड़ों से निकलने वाला निष्कर्ष

वर्ष 2023 में दर्ज मामलों की वृद्धि लगभग 31.15 प्रतिशत थी, जबकि 2024 में लगभग 17.95 प्रतिशत रही। इसलिए वृद्धि की दर कम होना और मामलों की कुल संख्या कम होना दो अलग स्थितियाँ हैं। इन आँकड़ों से दर्ज अपराधों की प्रवृत्ति का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन वास्तविक घटनाओं की संख्या में ठीक इसी अनुपात में वृद्धि सिद्ध नहीं होती।

साइबर अपराध में प्रतिशत वृद्धि कैसे निकाली जाती है?

दो वर्षों के आँकड़ों की तुलना में केवल मामलों का अंतर देखना पर्याप्त नहीं होता। प्रतिशत परिवर्तन बताता है कि पहले वर्ष की संख्या के अनुपात में अगले वर्ष कितना बदलाव हुआ।

प्रतिशत परिवर्तन का सूत्र

प्रतिशत परिवर्तन = [(नए वर्ष के मामले − पिछले वर्ष के मामले) ÷ पिछले वर्ष के मामले] × 100

वर्ष 2023 में 86,420 और वर्ष 2024 में 1,01,928 मामले दर्ज हुए। दोनों का अंतर 15,508 है। इसे 86,420 से विभाजित करके 100 से गुणा करने पर लगभग 17.95 प्रतिशत वृद्धि प्राप्त होती है।

इस गणना का सही निष्कर्ष यह है कि वर्ष 2024 में दर्ज साइबर अपराधों की संख्या पिछले वर्ष से लगभग 17.95 प्रतिशत अधिक थी। इससे प्रत्येक नागरिक के साइबर अपराध का शिकार होने की संभावना में समान प्रतिशत वृद्धि सिद्ध नहीं होती।

कम आधार संख्या पर प्रतिशत वृद्धि का प्रभाव

मान लीजिए किसी राज्य में पहले वर्ष 10 और अगले वर्ष 30 मामले दर्ज हुए। वृद्धि 200 प्रतिशत होगी, लेकिन वास्तविक संख्या में केवल 20 मामले बढ़े हैं। दूसरे राज्य में 5,000 से 6,000 मामले होने पर वृद्धि केवल 20 प्रतिशत होगी, जबकि अतिरिक्त मामलों की संख्या 1,000 है।

इसलिए प्रतिशत परिवर्तन के साथ मूल संख्या और वास्तविक संख्यात्मक अंतर भी प्रस्तुत करना चाहिए। कम मामले दर्ज करने वाले राज्यों में प्रतिशत वृद्धि को अकेले आधार बनाकर निष्कर्ष निकालना विशेष रूप से भ्रामक हो सकता है।

साइबर अपराध दर और कुल मामलों की संख्या में अंतर

किसी राज्य में साइबर अपराध के अधिक मामले दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि वहाँ जनसंख्या के अनुपात में अपराध दर भी सबसे अधिक है। बड़ी जनसंख्या वाले राज्य में कुल मामले अधिक हो सकते हैं, जबकि छोटी जनसंख्या वाले राज्य में कम मामलों के बावजूद अपराध दर अधिक हो सकती है।

प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध दर

अपराध दर = (दर्ज मामले ÷ संबंधित जनसंख्या) × 1,00,000

उदाहरण के लिए, किसी क्षेत्र की जनसंख्या 50 लाख और दर्ज मामले 1,000 हों, तो प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध दर 20 होगी। दूसरे क्षेत्र की जनसंख्या 10 लाख और मामले 400 हों, तो वहाँ अपराध दर 40 होगी। पहले क्षेत्र में कुल मामले अधिक हैं, लेकिन दूसरे क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में दर्ज मामलों की दर अधिक है।

अपराध दर की तुलना करते समय रिपोर्ट में प्रयुक्त जनसंख्या अनुमान और गणना पद्धति देखनी चाहिए। साइबर अपराध के वास्तविक जोखिम का आकलन करने में इंटरनेट उपयोग, डिजिटल लेनदेन और शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति जैसे कारक भी प्रासंगिक हो सकते हैं।

राज्यवार साइबर अपराध के आँकड़ों की तुलना

NCRB की राज्यवार तालिका से पता चलता है कि किसी वर्ष अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कितने साइबर अपराध दर्ज हुए। लेकिन केवल सबसे अधिक मामलों वाले राज्यों की सूची बनाकर उन्हें सबसे असुरक्षित राज्य घोषित करना उचित नहीं है।

वर्ष 2023 के NCRB आधारित आँकड़ों में कर्नाटक में 21,889, तेलंगाना में 18,236 और उत्तर प्रदेश में 10,794 साइबर अपराध दर्ज हुए थे। ये संख्याएँ संबंधित वर्ष के पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज मामलों का विवरण देती हैं। इनसे राज्यों में वास्तविक अपराध जोखिम का अंतिम क्रम निर्धारित नहीं किया जा सकता।

राज्यवार तुलना में महत्वपूर्ण कारक

राज्यवार तुलना में कुल मामले, जनसंख्या के अनुपात में अपराध दर, पिछले वर्षों का परिवर्तन और रिपोर्टिंग व्यवस्था देखनी चाहिए। यदि किसी राज्य में शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति या रिकॉर्डिंग व्यवस्था अलग हो, तो दर्ज मामलों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

यह भी जाँचना चाहिए कि आँकड़े पुलिस में दर्ज मामलों के हैं या ऑनलाइन शिकायतों के। NCRP की राज्यवार शिकायत संख्या और NCRB की दर्ज मामलों वाली तालिका को एक ही रैंकिंग में नहीं मिलाना चाहिए।

राज्यवार आँकड़ों की तुलना

किसी राज्य की स्थिति का मूल्यांकन करते समय समान वर्ष और समान अपराध श्रेणी के आँकड़े चुनें। इसके बाद कुल मामले, अपराध दर और वर्षवार परिवर्तन अलग-अलग देखें। केवल अधिक मामले दर्ज होने के आधार पर किसी राज्य को अधिक असुरक्षित घोषित न करें।

अपराध की श्रेणी के अनुसार आँकड़ों का अर्थ

NCRB की रिपोर्ट में साइबर अपराधों को विभिन्न अपराध शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है। किसी श्रेणी में दर्ज मामलों की संख्या उस वर्गीकरण के अंतर्गत रिकॉर्ड किए गए मामलों को दर्शाती है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उस प्रकार की सभी वास्तविक घटनाएँ पूरी तरह दर्ज हो गई हैं।

वर्ष 2024 के NCRB आधारित आँकड़ों में कंप्यूटर संबंधी अपराधों के अंतर्गत 36,920 मामले और साइबर आतंकवाद के अंतर्गत 18 मामले दर्ज हुए थे। इन संख्याओं का अंतर संबंधित श्रेणियों में दर्ज मामलों का अंतर है। इससे उनके नुकसान की गंभीरता या राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

वर्ष 2024 में साइबर आतंकवाद के अंतर्गत 18 मामले दर्ज होने का अर्थ केवल संबंधित अपराध शीर्षक के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या है। कम संख्या से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि ऐसे अपराधों का संभावित प्रभाव भी कम है। साइबर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा का संबंध केवल दर्ज मामलों की संख्या से निर्धारित नहीं होता; प्रभावित प्रणाली, घटना की प्रकृति और संभावित परिणाम भी महत्वपूर्ण होते हैं।

अपराध वर्गीकरण बदलने का प्रभाव

यदि किसी रिपोर्ट में नई अपराध श्रेणी जोड़ी जाए, पुराने शीर्षक को विभाजित किया जाए या रिकॉर्डिंग की पद्धति बदली जाए, तो वर्षवार तुलना प्रभावित हो सकती है। किसी नई श्रेणी में मामले दिखाई देने का अर्थ यह नहीं कि उस प्रकार के अपराध पहली बार उसी वर्ष हुए।

ऐसी स्थिति में रिपोर्ट की टिप्पणियाँ और वर्गीकरण संबंधी निर्देश देखना आवश्यक है। अलग परिभाषाओं वाली श्रेणियों को जोड़कर कृत्रिम वृद्धि या कमी नहीं दिखानी चाहिए।

वित्तीय साइबर धोखाधड़ी के आँकड़ों का सही अर्थ

वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की सरकारी रिपोर्टों में शिकायतों की संख्या के साथ रिपोर्ट की गई धनराशि, लियन के अंतर्गत चिह्नित राशि और वास्तव में वापस की गई राशि के आँकड़े मिलते हैं। इनमें प्रत्येक संख्या का अलग अर्थ होता है। विशेष रूप से UPI Fraud में Fund Recall और Account Freeze की प्रक्रिया से संबंधित आँकड़ों को पीड़ित को वापस मिली राशि के बराबर नहीं माना जा सकता।

रिपोर्ट की गई धोखाधड़ी की राशि

यह वह धनराशि है जिसे संबंधित रिपोर्टिंग प्रणाली में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी राशि के रूप में दर्ज किया गया है। इसे देश में हुई सभी वित्तीय साइबर धोखाधड़ियों के वास्तविक कुल नुकसान के बराबर नहीं माना जा सकता।

लियन के अंतर्गत चिह्नित राशि

यह वह राशि है जिसे संबंधित प्रक्रिया में रोक या लियन के अंतर्गत चिह्नित किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी राशि पीड़ित के खाते में वापस पहुँच गई है।

वापस की गई राशि

वापस की गई राशि वह है जिसकी वास्तविक वापसी संबंधित सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है। यह लियन के अंतर्गत चिह्नित राशि से अलग होती है। किसी धोखाधड़ी में रकम रोकना और पीड़ित को वापस मिलना दो अलग स्थितियाँ हैं। धनराशि की वापसी से जुड़ी प्रक्रिया UPI Fraud में पैसे वापस माँगने के विषय से संबंधित है, जबकि सरकारी आँकड़ों में दोनों राशियों को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है।

वित्तीय धोखाधड़ी के आधिकारिक आँकड़े

गृह मंत्रालय के 22 जुलाई 2026 के उत्तर के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान NCRP पर वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की 53,87,905 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई थीं। इसी अवधि में रिपोर्ट की गई राशि ₹56,087 करोड़ से अधिक, लियन के अंतर्गत चिह्नित राशि ₹9,079 करोड़ से अधिक और वापस की गई राशि ₹206 करोड़ से अधिक बताई गई थी।

ये आँकड़े गृह मंत्रालय के 22 जुलाई 2026 के आधिकारिक उत्तर में प्रकाशित किए गए थे। इनमें शिकायतों की संख्या और धनराशि से संबंधित प्रत्येक आँकड़े का अलग अर्थ है।

धनराशि के आँकड़ों में अंतर

रिपोर्ट की गई, लियन के अंतर्गत चिह्नित और वापस की गई राशि को जोड़ना उचित नहीं है। इनका प्रतिशत अनुपात निकालते समय भी यह जाँचना चाहिए कि संबंधित राशियाँ समान शिकायत समूह, अवधि और रिकॉर्ड स्थिति से संबंधित हैं या नहीं।

रिपोर्टिंग वर्ष और प्रकाशन वर्ष में अंतर

सरकारी रिपोर्ट जिस वर्ष प्रकाशित होती है, उसके आँकड़े आवश्यक नहीं कि उसी वर्ष के हों। उदाहरण के लिए, वर्ष 2026 में प्रकाशित गृह मंत्रालय के उत्तर में NCRB के वर्ष 2024 के आँकड़े दिए गए थे। यहाँ 2026 प्रकाशन का वर्ष है, जबकि 2024 अपराधों की रिपोर्टिंग अवधि है।

कैलेंडर वर्ष और वित्त वर्ष को भी अलग रखना चाहिए। कैलेंडर वर्ष जनवरी से दिसंबर तक होता है, जबकि भारत में सामान्य वित्त वर्ष अप्रैल से अगले मार्च तक होता है। वर्ष 2024 और वित्त वर्ष 2024-25 की अवधि समान नहीं है।

बदलते और संशोधित आँकड़े

NCRP जैसी परिचालन प्रणालियों में उपलब्ध संख्या समय के साथ अद्यतन हो सकती है। दूसरी ओर, प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट निर्धारित अवधि का संकलित विवरण प्रस्तुत करती है। इसलिए अलग तारीखों पर प्रकाशित सरकारी उत्तरों की संख्या में अंतर होने पर उनके स्रोत, अवधि और गणना की इकाई का मिलान करना चाहिए।

साइबर अपराध के आँकड़ों की सीमाएँ

रिपोर्ट नहीं की गई घटनाएँ

सभी साइबर अपराधों की शिकायत दर्ज होना आवश्यक नहीं है। कुछ पीड़ित घटना की रिपोर्ट नहीं करते और कुछ घटनाओं का पता देर से चलता है। कई बार व्यक्ति को यह भी स्पष्ट नहीं होता कि उसके साथ हुई घटना साइबर अपराध है या नहीं। साइबर अपराध की पहचान से संबंधित कठिनाइयाँ रिपोर्टिंग को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए दर्ज मामलों की संख्या को वास्तविक घटनाओं की पूर्ण गणना नहीं माना जा सकता।

अलग-अलग गणना इकाइयाँ

एक रिपोर्ट शिकायतों को गिन सकती है, दूसरी FIR को और तीसरी तकनीकी सुरक्षा घटनाओं को। इनकी संख्या अलग होना स्वाभाविक है। रिपोर्टों को जोड़ने से पहले उनकी गणना इकाई और रिकॉर्डों के बीच संभावित ओवरलैप देखना चाहिए।

डेटा का दायरा और वर्गीकरण

किसी सरकारी रिपोर्ट में केवल वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें हो सकती हैं, जबकि दूसरी रिपोर्ट में सभी दर्ज साइबर अपराध शामिल हो सकते हैं। इसी प्रकार महिलाओं और बच्चों से संबंधित साइबर अपराधों के आँकड़ों का विश्लेषण अलग अपराध श्रेणियों के आधार पर किया जा सकता है। महिलाओं और बच्चों से संबंधित साइबर अपराध के आँकड़े पढ़ते समय संबंधित श्रेणियों की परिभाषा और रिपोर्टिंग अवधि देखना आवश्यक है।

सांख्यिकीय संबंध और वास्तविक कारण

किसी वर्ष इंटरनेट उपयोग बढ़ने के साथ दर्ज साइबर अपराध भी बढ़े हों, तो इससे अकेले यह साबित नहीं होता कि इंटरनेट उपयोग बढ़ना ही अपराध बढ़ने का कारण था। कारण निर्धारित करने के लिए अन्य परिस्थितियों और अतिरिक्त साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।

आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

आधिकारिक रिकॉर्ड से दर्ज मामलों की संख्या, वर्षवार परिवर्तन और अपराध श्रेणियों का वितरण बताया जा सकता है। वास्तविक अपराधों की कुल संख्या, अपराध का निश्चित कारण या प्रत्येक व्यक्ति का जोखिम निर्धारित करने के लिए अधिक जानकारी आवश्यक है।

सरकारी साइबर अपराध आँकड़ों का व्यावहारिक विश्लेषण

NCRB के वर्ष 2022, 2023 और 2024 के आँकड़ों को एक साथ देखने पर दर्ज मामलों की संख्या क्रमशः 65,893, 86,420 और 1,01,928 थी। वर्ष 2023 में पिछले वर्ष से लगभग 31.15 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि वर्ष 2024 में वृद्धि लगभग 17.95 प्रतिशत रही।

इससे दो अलग निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, तीनों वर्षों में दर्ज मामलों की संख्या बढ़ी। दूसरा, वर्ष 2024 में वृद्धि की प्रतिशत दर 2023 की तुलना में कम रही। इसलिए वृद्धि की गति कम होना और कुल मामलों की संख्या घटना एक ही बात नहीं है।

यदि इसी अवधि के NCRP शिकायत आँकड़े सामने रखे जाएँ, तो उन्हें NCRB के मामलों में जोड़कर कुल साइबर अपराध नहीं निकाले जाएँगे। NCRP शिकायतों और NCRB मामलों की गणना का आधार अलग है। इसी प्रकार CERT-In की तकनीकी घटनाओं को भी दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या में नहीं जोड़ा जा सकता।

राज्यवार तुलना में पहले समान वर्ष और समान अपराध श्रेणी चुनी जाएगी। उसके बाद कुल मामलों के साथ जनसंख्या के अनुपात में अपराध दर देखी जाएगी। यदि रिपोर्टिंग की पद्धति या अपराध वर्गीकरण में अंतर हो, तो उसे विश्लेषण की सीमा के रूप में स्पष्ट किया जाएगा।

आधिकारिक स्रोत एवं संदर्भ

  1. गृह मंत्रालय — राष्ट्रीय साइबर अपराध आँकड़े (21 जुलाई 2026)
  2. गृह मंत्रालय — राष्ट्रीय साइबर अपराध प्रतिक्रिया तंत्र (22 जुलाई 2026)
  3. गृह मंत्रालय — साइबर सुरक्षा घटनाओं के आँकड़े (24 मार्च 2026)

मुख्य बातें (Key Takeaways)

एक नज़र में
  • NCRB पुलिस में दर्ज साइबर अपराधों का सांख्यिकीय विवरण प्रकाशित करता है।
  • NCRP की शिकायतें स्वतः अलग-अलग FIR नहीं होतीं।
  • CERT-In की साइबर सुरक्षा घटनाएँ और NCRB के दर्ज अपराध अलग सांख्यिकीय इकाइयाँ हैं।
  • कुल मामले, अपराध दर और प्रतिशत वृद्धि अलग-अलग जानकारी देते हैं।
  • प्रतिशत वृद्धि कम होने पर भी दर्ज मामलों की कुल संख्या बढ़ सकती है।
  • राज्यवार तुलना में केवल अधिक मामलों के आधार पर वास्तविक अपराध जोखिम निर्धारित नहीं किया जा सकता।
  • वित्तीय धोखाधड़ी में रिपोर्ट की गई, लियन के अंतर्गत और वापस की गई राशि अलग होती है।
  • प्रत्येक आँकड़े के साथ उसका स्रोत, अवधि और गणना का आधार देखना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या NCRB और NCRP के आँकड़े समान होते हैं?

नहीं। NCRB पुलिस में दर्ज अपराधों का सांख्यिकीय विवरण प्रकाशित करता है, जबकि NCRP नागरिकों से प्राप्त साइबर अपराध शिकायतों का पोर्टल है। दोनों के आँकड़ों का उद्देश्य और गणना की इकाई अलग है।

क्या सबसे अधिक साइबर अपराध वाला राज्य सबसे असुरक्षित है?

केवल दर्ज मामलों की संख्या से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। जनसंख्या के अनुपात में अपराध दर, रिपोर्टिंग व्यवस्था और अन्य संबंधित परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।

साइबर अपराध दर का क्या अर्थ है?

अपराध दर निर्धारित जनसंख्या के अनुपात में दर्ज मामलों की संख्या दर्शाती है। सामान्यतः इसे प्रति एक लाख जनसंख्या पर व्यक्त किया जाता है।

साइबर शिकायतों की संख्या FIR से अधिक क्यों हो सकती है?

शिकायत प्राप्त होना और FIR दर्ज होना अलग प्रक्रियाएँ हैं। एक घटना से अनेक शिकायतें संबंधित हो सकती हैं और शिकायतों पर आगे की कार्रवाई उनकी प्रकृति तथा उपलब्ध जानकारी के अनुसार होती है।

क्या दर्ज साइबर अपराध बढ़ने से वास्तविक अपराध भी उतने ही बढ़ते हैं?

आवश्यक नहीं। दर्ज मामलों में वृद्धि वास्तविक घटनाओं, रिपोर्टिंग व्यवहार, रिकॉर्डिंग व्यवस्था और अन्य कारणों से प्रभावित हो सकती है। केवल दर्ज मामलों के आधार पर वास्तविक अपराधों की समान अनुपात में वृद्धि सिद्ध नहीं होती।

क्या लियन के अंतर्गत राशि पीड़ित को वापस मिल चुकी होती है?

नहीं। लियन के अंतर्गत चिह्नित राशि और वास्तव में वापस की गई राशि अलग हैं। दोनों को समान मानने से वित्तीय धोखाधड़ी के आँकड़ों का गलत अर्थ निकल सकता है।

CERT-In की घटनाएँ NCRB के मामलों से अधिक क्यों होती हैं?

CERT-In साइबर सुरक्षा घटनाओं की रिपोर्टिंग और ट्रैकिंग करता है, जबकि NCRB पुलिस द्वारा दर्ज अपराधों का विवरण देता है। दोनों प्रणालियों की परिभाषाएँ और गणना का उद्देश्य अलग हैं।

भारत में साइबर अपराध के नवीनतम आधिकारिक आँकड़े कहाँ मिलते हैं?

दर्ज अपराधों के लिए NCRB की Crime in India रिपोर्ट और गृह मंत्रालय के आधिकारिक प्रकाशन उपयोगी हैं। शिकायतों तथा वित्तीय धोखाधड़ी के लिए NCRP और I4C संबंधी सरकारी विवरण देखे जा सकते हैं। नवीनतम रिपोर्ट का वर्ष और प्रकाशन की तारीख अलग से जाँचनी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत में साइबर अपराध के आधिकारिक आँकड़े अपराधों की स्थिति और समय के साथ उनमें होने वाले बदलाव का महत्वपूर्ण आधार हैं। NCRB की रिपोर्ट से पुलिस में दर्ज मामलों की संख्या, अपराध श्रेणियों और राज्यवार वितरण की जानकारी मिलती है, जबकि NCRP, I4C और CERT-In के आँकड़े शिकायतों, वित्तीय धोखाधड़ी तथा साइबर सुरक्षा घटनाओं के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। इन सभी स्रोतों का उपयोग करते समय उनकी गणना की इकाई और रिपोर्टिंग अवधि का अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

वर्षवार आँकड़ों में वृद्धि केवल मामलों की संख्या से नहीं, बल्कि प्रतिशत परिवर्तन और उसके आधार से भी समझी जानी चाहिए। इसी प्रकार किसी राज्य में अधिक मामले दर्ज होना अपने आप में वहाँ अधिक अपराध जोखिम का प्रमाण नहीं है। राज्यवार तुलना में जनसंख्या के अनुपात में अपराध दर, रिपोर्टिंग व्यवस्था और अपराध श्रेणियों का महत्व भी होता है। वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में रिपोर्ट की गई, रोकी गई और वास्तव में वापस की गई धनराशि को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है।

सरकारी आँकड़ों से दर्ज अपराधों की प्रवृत्ति और विभिन्न क्षेत्रों में उनके वितरण का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन उनसे वास्तविक घटनाओं की कुल संख्या या अपराध बढ़ने के निश्चित कारण का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी भी सांख्यिकीय निष्कर्ष की विश्वसनीयता उसके स्रोत, अवधि, परिभाषा और तुलना की पद्धति पर निर्भर करती है। इन्हीं आधारों पर साइबर अपराध की सरकारी रिपोर्टों का अधिक सटीक और संतुलित विश्लेषण संभव है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े आधिकारिक सरकारी प्रकाशनों पर आधारित हैं। इनकी व्याख्या और विश्लेषण स्वतंत्र संपादकीय उद्देश्य से किया गया है। कानून की बात किसी सरकारी विभाग या एजेंसी से संबद्ध नहीं है। अद्यतन एवं संशोधित आँकड़ों के लिए संबंधित मूल सरकारी प्रकाशन देखें।